ट्रेंड vs जनसैलाब
एक नेता है, जिसके एक आह्वान पर देश थाली बजा देता है, दीया जला देता है।
एक यूट्यूबर है, जिसके सिर्फ "Hello Friends" पर लाखों लोग जुड़ जाते हैं।
सोचो जिस दिन ये दोनों कह दें - "चलो, जंतर-मंतर पर मिलते हैं।"
उस दिन समझ आएगा कि ट्विटर पर ट्रेंड कराना और जमीन पर जनसमर्थन लाना, दो अलग-अलग बातें हैं।
कीबोर्ड की क्रांति एक तरफ, और जनता का सैलाब एक तरफ।
उस दिन भीड़ का गणित सारे अहंकार का हिसाब कर देगा।
जिस नेता के एक आह्वान पर करोड़ों भारतीय आँख बंद करके थाली बजाने लगें,
जिसके साधारण “Hello Friends” पर लाखों व्यूज़ आ जाएँ…
ज़रा सोचिए, अगर वही एक दिन कह दें:
“मित्रों, जंतर-मंतर पर मिलते हैं।”
फिर न तथाकथित क्रांतिकारियों की अराजकता बचेगी,
न वामपंथियों का अहंकार,
न धमकी देने वालों की कोई गलतफहमी।
उस दिन सबको जनसमर्थन की असली ताकत समझ आ जाएगी। 😏
क्योंकि ट्रेंड चलाना आसान है, जनसमर्थन जुटाना कठिन।
और भाषणों में क्रांति करने वालों को उस दिन संख्या का गणित भी समझ आ जाएगा। 😉