ये नंदी भगवान जी, नित्य प्रति आकर दरवाजे पर बैठ जाते हैं, फिर मेरी जिम्मेदारी इनके गोबर उठाने की बढ़ जाती है। 🙏😂
नित्य प्रातः यही बैठे मिलेगें, जबकि इनका आगमन रात्रि प्रहर में होता है, और रात्रि निवास यही होता है, और प्रातः उठकर निकल लेते हैं, यह इनकी दिन चर्या भी है।
संत श्री तुलसी दास जी द्वारा एक चौपाई श्रीराम चरित मानस में एक चौपाई उल्लेखित किया गया है -
हित अनहित पशु पंछी जाना...
पशु पंछी भी अपने हित और अनहित बखुबी जानते हैं, फिर वहां ये क्यों जाना चाहेंगे जहां, इनके जाते ही कोई लाठी लेकर दौड़ पड़े।
मेरे यहां ये नंदी जी आदर, स्नेह पाते हैं, दो रोटी पा जाते हैं, और लोगों का सवाल यह होता है कि यह, यहीं क्यों बैठता है?
कुछ श्रद्धावान महिला - पूरुष तो नदी जी का ही मान देते हैं और कहते हैं -
आप का शौभाग्य है जो ऩदी जी शोभा बढ़ाते हैं।
जैसे ही ये उठेंगे गोबर कर के ही आगे बढ़ते हैं, और हमारी जिम्मेदारी गोबर उठाने की होती, जिसे मैं बड़े शौक से करता हूं। 🙏
मेरे मन के भावों पर आप सभी के विचार आमंत्रित हैं।