भारतीय समाज में जाति का प्रभाव केवल विवाह, सामाजिक संबंधों, भूमि या रोजगार तक सीमित नहीं है ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, ज्ञान के संस्थानों, साहित्यिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक संसाधनों तक पहुँच में घोर असमानताएँ व्याप्त हैं। इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में यह सवाल प्रासंगिक है कि साहित्यिक प्रतिष्ठा किस प्रकार निर्मित होती है, किन लेखकों को पाठ्यक्रम में जगह मिलती है और किनकी रचनाएँ साहित्यिक विमर्श के केंद्र तक नहीं पहुँच पातीं।
सवर्णों से भरी गंगा’ शीर्षक से बसावन इंडिया के यह सवाल अंततः हिंदी साहित्य के किसी एक पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है। यह इस बात की पड़ताल है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था अपने समाज की विविधता, ऐतिहासिक असमानताओं और संवैधानिक मूल्यों को किस हद तक प्रतिबिंबित करती है।
पत्रिका में प्रकाशित आँकड़े संबंधित पाठ्यपुस्तक में प्रतिनिधित्व की जाँच करने का आधार प्रस्तुत करते हैं पुस्तक में लेखकों की सूची, सामाजिक वर्गीकरण और पाठ्य सामग्री यह निर्धारित किया है कि प्रतिनिधित्व की असमानता कितनी व्यापक है और उसके पीछे कौन-से संस्थागत कारण काम कर रहे हैं।
जो संघी ताकतें ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, डॉ. आंबेडकर और पेरियार के विचारों को ‘जहर’ बताकर खारिज कर रही हैं, वे अब विश्वविद्यालयों में समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन के नाम पर बहुजन महापुरुषों के विचारों को पाठ्यक्रमों से हटाकर महापुरुषों के विचारों से दूर करने की असफल साजिश कर रहे हैं यदि पाठ्यक्रमों में इन विचारकों का उल्लेख केवल औपचारिक बना दिया जाए, उनके संघर्षों की धार को कमजोर कर दिया जाए या उनके वैज्ञानिक, तर्कवादी और सामाजिक न्याय के संदेश को छिपा दिया जाए, तो यह शिक्षा में समावेशन नहीं, बल्कि वैचारिक विरूपण होगा।
फुले, सावित्रीबाई फुले, आंबेडकर और पेरियार ने शिक्षा को मुक्ति, समानता और आत्मसम्मान का साधन माना। इसलिए युवाओं को उनके विचारों से दूर करने के बजाय उनके मूल लेखन, आंदोलनों और सामाजिक संदर्भों से आलोचनात्मक रूप से परिचित कराना चाहिए। विद्यार्थियों को यह समझना जरूरी है कि जाति-विरोध, स्त्री शिक्षा, तर्कवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और संवैधानिक समानता किसी एक दल या सरकार की देन नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संघर्षों का परिणाम हैं।
यदि संविधान सभी नागरिकों को समानता और गरिमा का अधिकार देता है, तो शिक्षा व्यवस्था का दायित्व है कि वह इन मूल्यों को केवल पुस्तकों में लिखे सिद्धांतों तक सीमित न रखे, बल्कि उन्हें अपने व्यवहार और निर्णयों में भी प्रतिबिंबित करे।
डॉ. आंबेडकर के सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण से प्रेरणा लेते हुए शिक्षा को ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। लेकिन क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इन संवैधानिक मूल्यों को पूरी तरह प्रतिबिंबित करती है? क्या हिंदी की पाठ्यपुस्तकें भारत के सभी सामाजिक समुदायों की साहित्यिक परंपराओं, ऐतिहासिक अनुभवों और वैचारिक योगदानों को उचित स्थान देती हैं? या पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में कुछ विशेष सामाजिक समूहों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है? इसमें जन्म किसी व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता, सामाजिक प्रतिष्ठा या ज्ञान तक पहुँच का निर्धारक न बने।
ब्राह्मण साहित्यकारों की रचनाएँ भारतीय साहित्य की धरोहर हैं तो दलित, आदिवासी, पिछड़े व पासमंदा तथा अन्य वंचित समुदायों का साहित्य भी भारतीय साहित्य की धरोहर हैं किसी की उपस्थिति समस्या नहीं है; समस्या तब है, जब किसी की अनुपस्थिति को सामान्य मान लिया जाए।
हिंदी पाठ्यपुस्तकों का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को परीक्षा के लिए तैयार करना नहीं होना चाहिए। उन्हें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी चाहिए जो जातिगत श्रेष्ठता और हीनता के विचारों पर प्रश्न उठाए, विविधता का सम्मान करे, फुले, आंबेडकर और पेरियार जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के विचारों को समझे और समानता, तर्क तथा मानवीय गरिमा को अपने सामाजिक जीवन का आधार बनाए।
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