साल भर चिल्लाते हैं कि
"रामायण-महाभारत" और "वेद-पुराण"
सब काल्पनिक हैं, कपोल-कल्यित गपें हैं!
लेकिन जैसे ही कोई त्योहार आता है, फिर:-
अर्जुन ने चिड़िया की आँख की जगहहमारी गान में बाण मार दिया!
एकलव्य के कटे अँगूरठे का नाखुन
हमारी गान में लग गया, खुन आ रहा है!"
होलिका की आग से हमारी झां टें जल गई!
भीम ने गदा से हमारे आंड़ फोड़ दिए..
बासुकी ने नीला उगल दिया हमारे ऊपर..
वरुण देव ने 5000 साल से पानी नहीं दिया..
जब ग्रंथ काल्पनिक हैं, तो काल्पनिक ही मानो ना नीलचट्टों..