🪷 श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 2, श्लोक 11
“The wise do not grieve for the living or the dead…”
श्रीभगवानुवाच ।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं
प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च
नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
🪷 Meaning :
“Lord Krishna said: You grieve for those who should not be grieved for, yet speak words of wisdom. The wise do not grieve for those who are dead or those who are living.”
🪷 Insight :
अर्जुन का दुःख स्वाभाविक था, लेकिन श्रीकृष्ण उसे दुःख से बाहर निकालने के लिए उसकी दृष्टि बदलना शुरू करते हैं। अर्जुन अपने सामने खड़े लोगों को केवल शरीर और रिश्तों के रूप में देख रहा था, इसलिए उन्हें खोने का विचार उसे भीतर से तोड़ रहा था।
श्रीकृष्ण यहाँ समझाते हैं कि जो दिखाई देता है, वह अस्तित्व का पूरा सत्य नहीं है। शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा के विषय में दृष्टि इससे कहीं गहरी है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति जीवन और मृत्यु को केवल शरीर के आने-जाने के रूप में नहीं देखता।
यह श्लोक दुःख को दबाने की शिक्षा नहीं देता, बल्कि दुःख को एक व्यापक दृष्टि से समझने की शुरुआत करता है। जब हमारी दृष्टि केवल परिस्थिति से हटकर जीवन के गहरे सत्य पर टिकती है, तब वही दुःख ज्ञान का द्वार बन सकता है। 🪷
BHAGAVAD GEETA — 2.11 🪷