Anti Caste, Writer " Social Activist" जो जुल्म के खिलाफ बात नहीं करता, वह समाज का गुनहगार है ⚖️ Equality, Social justice ⚖️

Land of Buddha
पंडे का बच्चा झोली डालकर चून माँग सकता है, ये तो पंडों का धंधा है। @grok बताओ ये पाखंडी कैसे लोगो को भ्रमित करते हैं,और ठगते हैं
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मनुष्यों के साथ के अभाव में, मैंने किताबों का साथ ढूँढा, और पढ़ा, पढ़ता रहा पढ़ने में तल्लीन मैं अपना अकेलापन भूल गया..!! - डॉ. भीमराव अम्बेडकर 💙 #जयभीम 💙
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भगत सिंह को याद करके !! भगत सिंह को याद करके जुल्म का विरोध कर सकते हो क्या ? भगत सिंह को याद करके इस सड़ी व्यवस्था के खिलाफ बोल सकते हो क्या ? भगत सिंह को याद करके धार्मिक रूढ़ियों के खिलाफ खड़े हो सकते हो क्या ? भगत सिंह को याद करके जातिवाद के खिलाफ लिख सकते हो क्या ?
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लोग सरस्वती को ज्ञान की देवी बताते है। सरस्वती ने भारत देश के लिए ना तो कोई स्कूल खोला और ना ही ऐसा काम किया जो देश के लिए काम आया हो।
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जो तर्क नहीं करता वो धर्मांध है। जो तर्क नहीं कर सकता वो मूर्ख है। जो तर्क करने का साहस नहीं कर सकता वो गुलाम है। - तथागत
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आपको याद है कि आज ईवी रामास्वामी #पेरियार की जयंती है। वो पेरियार जिन्होंने अंधविश्वास व सामाजिक बुराईयों के खिलाफ दक्षिण भारत मे क्रांतिकारी परिवर्तन लाए और उनके विचारों से क्रांति की बड़ी लहर निकली जाति का समूल नाश तभी संभव है। जब ईश्वर, धर्म, शास्त्र और ब्रह्मणवाद का नाश हो
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"करोड़ों बच्चों का भविष्य गढ़ने वाले सम्मानित शिक्षक की योग्यता के लिए तो तुम्हें सैकड़ों परीक्षाएं और सबूत चाहिए, लेकिन देश का भविष्य तय करने वाले जज की कुर्सी के लिए सिर्फ 'बंद कमरे का कॉलेजियम नेटवर्क' काफी है? यह योग्यता नहीं, बौद्धिक पाखंड है।"
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निशु आजाद का आरोप है कि गाजियाबाद में उनके परिवार के मकान मालिक ने उन्हें 20 दिन के भीतर मकान खाली करने को कहा है। निशु ने दावा किया कि मकान मालिक ने पुलिस के कहने पर ऐसा किया है। हालांकि, पुलिस या मकान मालिक की ओर से इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। #NishuAzad
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राधाकृष्णनन की 5 उपलब्धि बताये जिसकारण उनके जन्मदिन पर #TeachersDay मनाया जा रहा है जबकि भारत ही नहीं पूरे विश्व ने अपना गुरु, बुद्ध को माना। माता सावित्रीबाई फुले जिन्होंने प्रथम महिला स्कूल खोल आधुनिक भारत में ब्राह्मणवाद को रौंदकर, स्त्री शिक्षा की नींव रखी उनके जन्मदिन पर #शिक्षक_दिवस क्यों न मनाया जाएँ?
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"जब तक समाज का शोषित और बहुजन वर्ग अपने इतिहास, संस्कृति और पौराणिक आख्यानों को वैज्ञानिक तथा तार्किक दृष्टिकोण से देखना शुरू नहीं करेगा, तब तक वह मानसिक और वैचारिक गुलामी की बेड़ियों को कभी नहीं काट सकेगा।" 🪷'सच्ची रामायण' और 'सच्ची रामायण की चाबी': ललई सिंह यादव का ऐतिहासिक वैचारिक संघर्ष एक विश्लेषण 🪷 बीसवीं सदी का उत्तरार्ध उत्तर भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना के संक्रमण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कालखंड रहा है, जिसमें सदियों से हाशिए पर धकेले गए शोषित और बहुजन समाज ने अपने आत्म-सम्मान और मानवीय अधिकारों की बहाली के लिए एक नए वैचारिक आंदोलन की नींव रखी थी। इस युगांतरकारी चेतना और बौद्धिक पुनर्जागरण के अग्रदूतों में पेरियार ललई सिंह यादव का नाम एक ऐसे निर्भीक, प्रखर और दूरदर्शी सामाजिक क्रांतिकारी के रूप में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जिन्होंने समाज में व्याप्त सांस्कृतिक वर्चस्ववाद, धार्मिक पाखंड और राजकीय दमन के खिलाफ अपनी कलम को सबसे अचूक हथियार बनाया था। वे केवल एक लेखक, प्रकाशक या कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे अनूठे वैचारिक संस्थान थे जिन्होंने उत्तर भारत की पारंपरिक रूढ़िवादी हिंदी पट्टी में तर्क, विज्ञान और मानवीय गरिमा पर आधारित आधुनिक चेतना का सूत्रपात किया था। ललई सिंह यादव के संपूर्ण जीवन संघर्ष, उनके अदम्य साहस और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता की सबसे प्रखर अभिव्यक्ति उनकी कालजयी कृति 'सच्ची रामायण' (अनुवाद एवं संपादन) तथा उसकी अकाट्य पूरक पुस्तक 'सच्ची रामायण की चाबी' के इर्द-गिर्द बुने गए ऐतिहासिक कानूनी और सामाजिक संघर्ष में दिखाई देती है। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय इतिहास में केवल दो पुस्तकों के प्रकाशन, उनके सामाजिक विरोध और उन पर लगाए गए राजनैतिक प्रतिबंध का कोई सामान्य मामला नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अभिव्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों की रक्षा, धार्मिक रूढ़िवादिता और औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त राजकीय दमन के बीच लड़ा गया अब तक का सबसे बड़ा और युगांतरकारी वैचारिक महायुद्ध था। दक्षिण भारत में आत्म-सम्मान आंदोलन, तर्कवाद और द्रविड़ चेतना की अलख जगाने वाले महान समाज सुधारक ई. वी. रामासामी पेरियार ने तमिल और अंग्रेजी भाषाओं में एक बेहद तार्किक और आलोचनात्मक पुस्तक लिखी थी, जिसका मूल शीर्षक 'द रामायना: ए ट्रू रीडिंग' था। इस ऐतिहासिक पुस्तक में पेरियार ने वाल्मीकि रामायण, तुलसीदास रचित रामचरितमानस और अन्य पौराणिक आख्यानों में वर्णित प्रसंगों का मानवीय, तार्किक और समतावादी दृष्टिकोण से विश्लेषण किया था। उन्होंने इन धार्मिक कथाओं में छिपे जातिगत भेदभाव, गैर-बराबरी, पितृसत्तात्मक मानसिकता और मूलनिवासी शोषित समाज को हीन दिखाए जाने की प्रवृत्तियों पर गंभीर सवाल उठाए थे। चूंकि यह पुस्तक मूल रूप से अंग्रेजी और तमिल भाषा में उपलब्ध थी, इसलिए उत्तर भारत का एक बहुत बड़ा बहुजन और शोषित समाज भाषाई बाधाओं के कारण पेरियार के इन युगांतरकारी विचारों से पूरी तरह अनभिज्ञ था। इस भाषाई और वैचारिक खाई को पाटने के उद्देश्य से ललई सिंह यादव ने 1968 में राम आधार के सहयोग से इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद 'सच्ची रामायण' के नाम से अपने 'अशोक पुस्तकालय' प्रकाशन से प्रकाशित कर दिया। ललई सिंह यादव ने न केवल इसका सरल और सुबोध अनुवाद किया, बल्कि उत्तर भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुकूल इसका संपादन भी किया ताकि हिंदी पट्टी की आम जनता इस तार्किक विमर्श को आसानी से समझ और आत्मसात कर सके। जैसे ही 'सच्ची रामायण' उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों के बाजारों, कस्बों और सुदूर गांवों में पहुंची, उत्तर भारत के पारंपरिक और रूढ़िवादी संभ्रांत समाज में एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया। समाज के प्रभुत्वशाली वर्ग ने इस पुस्तक को सनातन धर्म, लोक परंपराओं और अपने आराध्य देवों का सीधा अपमान माना तथा इसके खिलाफ तीखा राजनैतिक व सामाजिक विरोध शुरू कर दिया। तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने और बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाएं आहत होने का तर्क दिया। इसके परिणामस्वरूप सरकार ने 9 दिसंबर 1969 को दंड प्रक्रिया संहिता की तत्कालीन धारा 99-ए के तहत 'सच्ची रामायण' की प्रतियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। सरकारी आदेश जारी होते ही राजकीय तंत्र पूरी तरह सक्रिय हो गया और ललई सिंह यादव के अशोक पुस्तकालय सहित विभिन्न ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारकर पुस्तक की सभी उपलब्ध प्रतियों को जब्त कर लिया गया। सरकार का मानना था कि इस दमनकारी कदम से इस विद्रोही वैचारिक आवाज को हमेशा के लिए दबा दिया जाएगा, लेकिन ललई सिंह यादव केवल एक सामान्य लेखक या प्रकाशक नहीं थे, बल्कि वे कानून के गहरे जानकार, पूर्व सैनिक और एक बेहद दृढ़ निश्चयी क्रांतिकारी थे। उन्होंने राजकीय दमन के आगे घुटने टेकने के बजाय इस अन्यायपूर्ण प्रतिबंध को न्यायपालिका के सर्वोच्च मंच पर चुनौती देने का एक ऐतिहासिक और साहसिक संकल्प लिया। ललई सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस जब्तीकरण के आदेश को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहां उनके वकील बनवारी लाल ने अदालत में बेहद अकाट्य तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट किया कि यह पुस्तक किसी भी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के दुर्भावनापूर्ण इरादे से नहीं लिखी गई है, बल्कि यह एक विशुद्ध रूप से ऐतिहासिक, साहित्यिक और तार्किक समीक्षा है जो नागरिकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करती है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के तीन माननीय न्यायाधीशों की विशेष पूर्णपीठ ने इस पूरे मामले की गहन समीक्षा की और पाया कि राज्य सरकार अपने प्रतिबंधात्मक आदेश में यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि पुस्तक का इरादा वास्तव में समाज में विद्वेष फैलाना था। इसके साथ ही सरकार ने प्रतिबंध लगाने के ठोस कारणों का भी उल्लेख नहीं किया था, जिसके आधार पर 19 जनवरी 1971 को जस्टिस ए. कीर्ति की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार के प्रतिबंध को पूरी तरह निरस्त कर दिया और जब्त की गई सभी प्रतियों को ससम्मान वापस लौटाने के साथ-साथ सरकार पर हर्जाना भी लगाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट में मिली इस करारी शिकस्त से उत्तर प्रदेश सरकार बौखला गई और उसने अपनी हार स्वीकार करने के बजाय भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर कर दी। यह मुकदमा भारतीय कानूनी इतिहास का एक बेहद महत्वपूर्ण मामला बन गया जिसे 'उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव' के नाम से जाना जाता है। सुप्रीम कोर्ट में इस संवेदनशील मामले की सुनवाई के लिए तीन जजों की एक बेहद प्रतिष्ठित और प्रगतिशील खंडपीठ का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष देश के प्रख्यात न्यायविद न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर थे तथा अन्य दो सदस्यों में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली शामिल थे. इस ऐतिहासिक मामले पर 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से अपना युगांतरकारी फैसला सुनाया, जिसमें उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को सिरे से खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराया। न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने अपने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव बताते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी भी स्थापित धार्मिक आख्यान या विचार की आलोचना करना या उसके प्रति एक भिन्न ओर प्रगतिशील दृष्टिकोण रखना देश के प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य अपनी दमनकारी शक्ति का उपयोग करके वैचारिक विविधताओं और विचारों की स्वतंत्रता को कुचल नहीं सकता है और इस फैसले ने भारत में स्वतंत्र लेखन और दलित-बहुजन चेतना के इतिहास में हमेशा के लिए एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। 'सच्ची रामायण' की इस लंबी सामाजिक और अदालती लड़ाई के दौरान रूढ़िवादी विचारकों और सरकारी वकीलों का सबसे बड़ा तर्क यह था कि पेरियार अथवा ललई सिंह यादव द्वारा पौराणिक पात्रों पर उठाए गए सवाल पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और उनके समर्थन में मूल ग्रंथों के कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इस वैचारिक और अकादमिक चुनौती का करारा उत्तर देने के लिए ललई सिंह यादव ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण पूरक पुस्तक की रचना की, जिसका शीर्षक उन्होंने 'सच्ची रामायण की चाबी' रखा। ललई सिंह यादव ने वाल्मीकि रामायण, तुलसीदास रचित रामचरितमानस, पुराणों और अन्य प्रामाणिक हिंदू धर्मग्रंथों का बेहद बारीकी और गहराई से अध्ययन किया था। उन्होंने 'सच्ची रामायण की चाबी' में उन सभी मूल श्लोकों, कांडों, प्रसंगों, पृष्ठ संख्याओं और संदर्भों को प्रमाण सहित हूबहू दर्ज कर दिया, जिनके आधार पर 'सच्ची रामायण' में आलोचनात्मक टिप्पणियां की गई थीं। इस पुस्तक के प्रकाशन ने उनके धुर विरोधियों के मुंह पूरी तरह बंद कर दिए क्योंकि अब कोई भी उन पर बिना प्रमाण के लिखने का आरोप नहीं लगा सकता था। उन्होंने रूढ़िवादी विचारकों को उन्हीं के धर्मग्रंथों के उद्धरणों से परास्त करके यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल एक विद्रोही कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के शोधकर्ता और गंभीर विद्वान भी थे जो बिना अकाट्य साक्ष्यों के कोई बात समाज के सामने नहीं रखते थे। ललई सिंह यादव द्वारा 'सच्ची रामायण' और 'सच्ची रामायण की चाबी' के माध्यम से लड़ा गया यह ऐतिहासिक संघर्ष केवल दो किताबों को प्रतिबंधित होने से बचाने या किसी अदालती मुकदमे को जीतने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उत्तर भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक दिशा को हमेशा के लिए बदल देने वाला एक युगांतरकारी वैचारिक आंदोलन था। इस अभूतपूर्व संघर्ष ने उत्तर भारत के पिछड़ों, दलितों और शोषितों के भीतर एक ऐसे आत्म-सम्मान और चेतना को जन्म दिया, जिसने उन्हें सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक अधीनता को त्यागकर अपने इतिहास, अस्मिता और धार्मिक व्यवस्था को एक सर्वथा नए, वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो यदि ललई सिंह यादव ने अपनी सरकारी नौकरी को दांव पर लगाकर, आर्थिक तंगियों से जूझते हुए और जेल जाने का जोखिम उठाकर यह साहसिक कदम न उठाया होता, तो दक्षिण भारत के आत्म-सम्मान आंदोलन के नायक पेरियार ई. वी. रामासामी के क्रांतिकारी और मानवतावादी विचार कभी भी उत्तर भारत की आम जनता की रगों में वैचारिक चेतना बनकर नहीं दौड़ पाते। यदि हम इस पूरे घटनाक्रम और ललई सिंह यादव के संघर्ष का आज के वर्तमान परिदृश्य में मूल्यांकन करें, तो इसकी प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। समकालीन दौर में जब एक बार फिर से असहमति की आवाजों को दबाने, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संकुचित करने और वैचारिक विविधताओं पर एकरूपता थोपने के प्रयास दिखाई देते हैं, तब ललई सिंह यादव का यह संघर्ष लोकतंत्र के सजग प्रहरियों के लिए एक महान प्रकाश-स्तंभ की तरह कार्य करता है। आज के सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सूचना क्रांति के युग में, जहां सूचनाओं और विचारों की बाढ़ है, वहीं दूसरी ओर किसी भी भिन्न या आलोचनात्मक दृष्टिकोण को 'धार्मिक भावनाएं आहत होने' या 'कानून-व्यवस्था' का हवाला देकर प्रतिबंधित करने की प्रवृत्तियां अब भी समाज और राजनैतिक व्यवस्था में गहरी पैठ बनाए हुए हैं। ऐसी परिस्थितियों में, साल 1976 का माननीय सर्वोच्च न्यायालय का वह ऐतिहासिक फैसला आज भी स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका में असहमति के अधिकार की रक्षा करने और सत्ताओं द्वारा पुस्तकों या विचारों पर लगाए जाने वाले मनमाने व तानाशाही प्रतिबंधों के खिलाफ सबसे मजबूत और अकाट्य कानूनी नजीर के रूप में खड़ा है। आधुनिक बहुजन चेतना और समकालीन विमर्श के संदर्भ में ललई सिंह यादव द्वारा उठाई गई तार्किक और अकादमिक बहस आज अधिक परिपक्व रूप में दिखाई देती है। आज का युवा, शिक्षित और जागरूक बहुजन समाज जब इतिहास की पुनर्व्याख्या करता है, अपनी सांस्कृतिक जड़ों को तलाशता है और मुख्यधारा के आख्यानों पर सवाल उठाता है, तो उसकी वैचारिक आधारशिला में पेरियार ललई सिंह यादव का यही ऐतिहासिक संघर्ष काम कर रहा होता है। 'सच्ची रामायण की चाबी' लिखकर उन्होंने यह संदेश दिया था कि किसी भी व्यवस्था का विरोध केवल भावुकता या नारों से नहीं, बल्कि ठोस शोध, अकादमिक साक्ष्यों और अकाट्य प्रमाणों के आधार पर किया जाना चाहिए, जो कि आज के दौर के शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है। अंततः, ललई सिंह यादव का यह संघर्ष हमें निरंतर यह याद दिलाता रहता है कि एक सच्चे और जीवंत लोकतंत्र की पहचान इस बात से नहीं होती कि वह स्थापित विचारों की कितनी पूजा करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे तीखे और असहमत आलोचक को कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा प्रदान करता है।
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पोंगा पाखंडियों जनता से चढ़ावा, दान और धार्मिक आयोजनों के नाम पर पैसा लूटना क्या है?
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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 देश में अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत करता है और किसी भी रूप में इसके आचरण या प्रचार को प्रतिबंधित करता है। किंतु जब न्यायधीश की कुर्सी पर अन्यायी लोग बैठेंगे तो कैसे छुआछूत खत्म होगी और कैसे न्याय होगा? बात करते हैं मेरिट की। #कॉलेजियम_सिस्टम_बंद_करो
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सालो की इतनी जलन 😂😂
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हिंदू एकता का नारा तब तक महज एक राजनीतिक नाटक है, जब तक सवर्ण समाज दलित, आदिवासी और पिछड़ों के अधिकारों को स्वीकार करने से इनकार करता रहेगा। जो लोग मुसलमानों के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान करते हैं, लेकिन आरक्षण और सामाजिक न्याय की बात पर जातिगत नफरत भड़काते हैं, वे एकता की नहीं, बल्कि अपने वर्चस्व की रक्षा कर रहे हैं। भारत में तथाकथित सवर्ण समाज का घिनौना और ऐतिहासिक विरोधाभास: हिंदू एकता का मुखौटा तथा जाति की नंगी सच्चाई एक विश्लेषण भारत का तथाकथित सवर्ण समाज आज भी एक गहरे और ऐतिहासिक विरोधाभास में जी रहा है। जब बात मुसलमानों या किसी बाहरी धार्मिक अल्पसंख्यक के खिलाफ आती है, तो “हिंदू एकता”, “सभी हिंदू भाई-भाई हैं” और “धर्म खतरे में है” जैसे नारे सुनाई देने लगते हैं। लेकिन जैसे ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के संवैधानिक अधिकारों, आरक्षण, सामाजिक न्याय या सदियों से चले आ रहे उत्पीड़न की चर्चा होती है, वही एकता धूल में मिल जाती है। “मेधा खतरे में है”, “आरक्षण देश को बर्बाद कर रहा है” और “जातिवाद तो अब खत्म हो चुका है” जैसे तर्क सामने आने लगते हैं। यह कोई आकस्मिक विसंगति नहीं है। सदियों से जिन लोगों ने समाज के दरवाज़े बनाए, उन्होंने ही तय किया कि कौन भीतर प्रवेश करेगा और कौन बाहर रहेगा। जब बाहरी दुश्मन दिखता है, तो दरवाज़ा थोड़ा खोल दिया जाता है ताकि आंतरिक वर्चस्व सुरक्षित रह सके। लेकिन जब दलित-बहुजन अपने हक, सम्मान और बराबरी की माँग करते हैं, तो वही दरवाज़ा कठोर दीवार में बदल जाता है। जब तक जातिवाद, छुआछूत और जन्म पर आधारित भेदभाव की जड़ें पूरी तरह नहीं उखाड़ी जाएँगी, तब तक धर्म के नाम पर की जाने वाली कोई भी एकता अधूरी और खोखली रहेगी। बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने जाति का विनाश में स्पष्ट कहा कि जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है। यह जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता का पदानुक्रम थोपती है। उन्होंने बार-बार कहा कि जब तक जाति का पूर्ण विनाश नहीं होता, हिंदू समाज में सच्ची एकता संभव नहीं है। मुसलमानों के खिलाफ एकता दिखाना आसान है क्योंकि बाहरी “अन्य” को दुश्मन बनाकर आंतरिक विभेदों को छुपाया जा सकता है। लेकिन जब दलित-बहुजन अपने अधिकार माँगते हैं, तो सवर्ण वर्चस्व सीधे खतरे में पड़ जाता है। महात्मा ज्योतिराव फुले ने गुलामगिरी में ब्राह्मणवादी व्यवस्था को गुलामी की व्यवस्था बताया। उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों, कर्मकांडों और शिक्षा पर एकाधिकार के माध्यम से शूद्र-अतिशूद्रों को ज्ञान, संपत्ति तथा सम्मान से वंचित रखा गया। उन्होंने शिक्षा को मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार माना और सत्यशोधक समाज के माध्यम से जाति-उन्मूलन का संघर्ष चलाया। पेरियार ई.वी. रामासामी ने भी इस विरोधाभास को निर्भीकता से उजागर किया। उनके आत्म-सम्मान आंदोलन ने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवादी विचारधारा का विरोध किया। उनके लिए जातिवाद और छुआछूत को मिटाए बिना धर्म के नाम पर एकता महज राजनीतिक जुमला और सत्ता का हथियार थी। वर्तमान भारत में भी यह विरोधाभास दिखाई देता है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के समय “हिंदू खतरे में है” का नारा सभी जातियों को एक मंच पर लाने का प्रयास करता है। लेकिन प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर “आरक्षण से देश की गुणवत्ता गिर रही है”, “जातिवाद खत्म हो गया है” या “अब केवल मेधा को मौका दो” जैसे तर्क सामने आते हैं। जबकि जातिगत हिंसा, अंतर-जातीय विवाह पर हमले, शिक्षा और रोजगार में भेदभाव तथा गाँवों-मंदिरों में छुआछूत के मामले आज भी जारी हैं। फुले, आंबेडकर और पेरियार तीनों ने स्पष्ट किया कि धर्म के नाम पर की जाने वाली एकता तब तक अधूरी रहेगी जब तक जातिवाद, छुआछूत तथा जन्म पर आधारित भेदभाव समाप्त नहीं होते। सच्ची एकता समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित होनी चाहिए, न कि ऊँच-नीच की व्यवस्था पर। आज यदि “हिंदू एकता” को वास्तव में सार्थक बनाना है, तो जाति व्यवस्था के पूर्ण विनाश की दिशा में ईमानदार प्रयास करने होंगे। शिक्षा का लोकतंत्रीकरण, अंतर-जातीय विवाह का समर्थन, छुआछूत का अंत और सामाजिक व्यवहार में पूर्ण समानता आवश्यक है। सच्ची एकता का रास्ता जाति-उन्मूलन से होकर गुजरता है। जब तक यह सीख व्यवहार में नहीं उतारी जाती, तब तक “हिंदू एकता” का नारा महज एक मुखौटा बना रहेगा जो बाहरी दुश्मन के सामने चमकता है, लेकिन आंतरिक अन्याय के सामने तुरंत फट जाता है। जय भीम! जय संविधान! जय भारत!
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स्त्रियों का सबसे ज्यादा शोषण धर्मों ने किया है, फिर भी स्त्रियां सबसे ज्यादा धार्मिक कर्मकांडों में उलझी रहती हैं।” यह विचार समाज में स्त्री की स्थिति और धार्मिक परंपराओं के बीच संबंध पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। इतिहास में अनेक धार्मिक और सामाजिक परंपराओं का उपयोग स्त्रियों की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए किया गया। स्त्री के लिए क्या उचित है, उसे कैसे रहना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किससे विवाह करना चाहिए और उसके जीवन के निर्णय कौन लेगा इन अनेक सवालों पर धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं का प्रभाव रहा है। धार्मिक कर्मकांडों में स्त्रियों की भागीदारी स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब किसी कर्मकांड या परंपरा को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि स्त्री को अपने अधिकारों, स्वतंत्र सोच और समानता से दूर रखा जाए। जब किसी परंपरा के नाम पर स्त्री को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसका कर्तव्य केवल त्याग, सेवा और आज्ञापालन है, तब वह परंपरा उसके लिए बंधन बन सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर धार्मिक परंपरा को बिना प्रश्न किए स्वीकार करने के बजाय उसके सामाजिक प्रभाव को समझा जाना चाहिए। क्या वह परंपरा स्त्री को सम्मान और समानता देती है या उसके अधिकारों को सीमित करती है? यह प्रश्न करना आवश्यक है। कई बार बचपन से ही स्त्रियों को ऐसी मान्यताओं के साथ बड़ा किया जाता है जिनमें उनके जीवन, विवाह, परिवार और सामाजिक भूमिका को धार्मिक कर्तव्यों से जोड़ दिया जाता है। परिणामस्वरूप स्त्री स्वयं भी उन नियमों को अपने जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानने लगती है। लेकिन शिक्षा और जागरूकता का उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांडों को निभाना नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और स्वतंत्र अस्तित्व को समझना भी है। स्त्री को यह अधिकार होना चाहिए कि वह किसी भी परंपरा को अपनी इच्छा और विवेक से स्वीकार करे या अस्वीकार करे। किसी भी समाज की प्रगति तभी संभव है जब उसकी आधी आबादी को समान अधिकार, सम्मान और स्वतंत्र निर्णय का अवसर मिले। इसलिए धार्मिक विश्वास व्यक्तिगत विषय हो सकता है, लेकिन जब किसी विश्वास या कर्मकांड का उपयोग स्त्री की स्वतंत्रता और समानता को रोकने के लिए किया जाए, तब उस पर प्रश्न उठाना जरूरी है। स्त्री को केवल कर्मकांड निभाने वाली नहीं, बल्कि स्वतंत्र सोच रखने वाली मनुष्य के रूप में देखा जाना चाहिए। उसकी पहचान किसी धार्मिक भूमिका तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे शिक्षा, सम्मान, समानता और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का अधिकार मिलना चाहिए।
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“यदि ‘हिंदू’ विश्व के अन्य क्षेत्रों में बस या पलायन कर जाएं, तो भारतीय जाति व्यवस्था एक वैश्विक समस्या बन जाएगी।” - डॉ. बी. आर. अंबेडकर, 9 मई 1916 को कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रस्तुत एक शोध पत्र में।
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“If Hindus migrate to other regions on earth, Indian caste will become a world problem.” - Dr B. R. Ambedkar, in his paper he read on 9th May 1916, at the Colombia University.
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एक स्वतंत्र मस्तिष्क ही एक स्वतंत्र समाज का निर्माण कर सकता है। जब तक मनुष्य अपनी तार्किक क्षमता को किसी अदृश्य डर के आगे आत्मसमर्पण करता रहेगा, तब तक वह केवल एक जैविक रोबोट बना रहेगा, इंसान नहीं। धर्म, भय और वैचारिक बंधक: वर्तमान भारतीय परिदृश्य में इंसानी चेतना का संकट - एक विमर्श मानव सभ्यता के इतिहास में धर्म और भय के जिस दमनकारी अंतर्संबंध ने वैश्विक चेतना को जकड़ा है, उसका सबसे सघन और ज्वलंत रूप आज वर्तमान भारतीय परिदृश्य में देखा जा सकता है। भारत, जो कभी बुद्ध के 'अप्प दीपो भव' के आत्म-अन्वेषण और भौतिकवादी तर्कवाद की भूमि रहा है, आज ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ संस्थागत धर्म इंसानी सोचने-समझने की क्षमता को बंधक बनाने का हथियार बन चुका है। भारत आधुनिक तकनीक, इंटरनेट और AI के युग में आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसी तकनीक का उपयोग अंधविश्वासों, छद्म-विज्ञान और धार्मिक नफरत फैलाने में भी किया जा रहा है। सोशल मीडिया आज ऐसी 'डिजिटल अफीम' की फैक्ट्रियां बन चुके हैं जहाँ चमत्कारों की कहानियां, अंधविश्वास और काल्पनिक धार्मिक गौरव परोसा जाता है। शिक्षा ने डिग्रियां तो दी हैं, लेकिन सोचने की वैज्ञानिक क्षमता को धर्म के डर ने कुंद कर दिया है। वर्तमान दौर में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक, दोनों ही समुदायों के भीतर यह भय पैदा किया गया है कि "उनका धर्म खतरे में है।" इस दोहरे भय का परिणाम यह हुआ है कि आम जनता अपनी रोज़मर्रा की बुनियादी समस्याओं को भूल चुकी है। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण जैसे मुद्दों की जगह धार्मिक विवादों ने ले ली है। इस पूरे परिदृश्य में राजनीति और सत्ता तंत्र की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। चुनाव विकास, अर्थव्यवस्था, शिक्षा या स्वास्थ्य के मुद्दों के बजाय धार्मिक ध्रुवीकरण और प्रतीकों की राजनीति पर लड़े जाते हैं। धर्म का उपयोग असहमति की लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने और जनता के भीतर स्थायी डर पैदा करने के लिए किया जा रहा है। इस धार्मिक पाखंड की सबसे बड़ी मार महिलाओं, दलितों और हाशिए के समाजों पर पड़ती है। 'धार्मिक परंपराओं' के नाम पर महिलाओं की आज़ादी और सामाजिक गतिशीलता पर अंकुश लगाया जाता है तथा जातिगत भेदभाव को उचित ठहराने की कोशिशें की जाती हैं। वर्तमान भारत को इस वैचारिक और सांस्कृतिक पतन से बचाने का रास्ता एक व्यापक 'नव-पुनर्जागरण' आंदोलन है। ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार और बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर जैसे समाज सुधारकों के विचारों को आज के संदर्भ में नए सिरे से समझना होगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A(h) प्रत्येक नागरिक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना विकसित करने की बात करता है। यदि हम भारत को एक विकसित और आधुनिक राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं, तो हमें सवाल पूछने, संशय व्यक्त करने और सत्ताओं को चुनौती देने की आज़ादी को बहाल करना होगा। देश की भक्ति और धर्म की भक्ति दो अलग चीजें हैं। सच्ची देशभक्ति का अर्थ देश के सबसे कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय, समता और बंधुत्व की मांग करना है। मानसिक रूप से स्वतंत्र नागरिक ही एक महान राष्ट्र की असली नींव होते हैं। जय भीम! जय पेरियार! जय संविधान! जय भारत!
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आरक्षण पर बोलने से पहले संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 16(4A), 16(4B), 17 ,46, 330, 332, 340, 342A पढ़ो फिर आरक्षण पर बात करना!
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हमारी लड़ाई धन या सत्ता के लिए नहीं है। यह स्वतंत्रता की लड़ाई है। यह मानवीय व्यक्तित्व की पुनर्प्राप्ति की लड़ाई है। Dr Babasaheb Ambedkar
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