मुझे कुछ लोगों के सामने खुलकर बोलने का पछतावा है, वे मुझे उस तरह से जानने के लायक नहीं थे
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मैं छत पर बैठा था और मेरे पिताजी हमेशा की तरह मुझे समझा रहे थे कि अच्छा इंसान सब बनना चाहते हैं और वैसे रहना भी चाहते हैं, इसलिए अच्छा इंसान होना कोई गुनाह नहीं है। पर हम जिस समाज का हिस्सा हैं, वहाँ दिक्कत यह है कि कोई अच्छे इंसान को आराम से रहने नहीं देता। पर मैं फिर कभी कहूँगा कि अच्छा इंसान बने रहना ज़रूरी है। ​इतना कह के उन्होंने मुझे दुनाली उठाने को कहा और बोले "चल बंदूक साफ़ कर।" ​और मैं साफ़ करने लग गया। मेरे बंदूक साफ़ करते करते वे फिर से कहने लगे "अच्छा इंसान बनना है तुझे भी, पर अगर सिर से पानी उतर जाए और कोई ऑप्शन न बचे, तो जो हाथ में है इसी को अपना अच्छा इंसान बना लेना, फिर बुरे इंसान भी कहेंगे कि अच्छा इंसान होना इतना बुरा भी नहीं है...
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सोशल मीडिया कठिन है भाई, और यहाँ पर दोस्त बनाना या थोड़ा बहुत भी भरोसा करना तो उससे भी कहीं ज़्यादा मुश्किल है मेरे लिए तो... और कोई आपका साथ देगा या कुछ आपकी मदद करेगा, यह भी किसी जुए से कम नहीं है। इसलिए कुल मिलाकर इतना ही समझ आया है कि अपना पोस्ट करो और बस आगे बढ़ते रहो, यहाँ पर किसी से भी ज़्यादा जुड़े रहना सही नहीं है... और यही वजह है कि सब (DM) बंद करने के लिए मुझे सबको अनफॉलो (unfollow) करना पड़ा। थोड़ा अजीब लगा, लेकिन कोई विकल्प बचा नहीं था।
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तुम्हारे उस बस्ते की दावत स्वीकार है... 🤍 ​तुमने ठीक कहा, उस बस्ते में सिर्फ़ मेरी हँसी या मेरी जीत ही नहीं, मेरी वे तमाम उदास रातें और अनकहे डर भी होंगे, जिन्हें मैंने खुद से भी छुपाकर रखा था। ​जब तुम उस बस्ते को खोलोगी, तो तुम्हें वहाँ एक ऐसी डायरी भी मिलेगी जिसके पन्ने मेरे आंसुओं से थोड़े भीगे हुए हैं। तुम्हें दिखेंगे वे टूटे हुए ख्वाब, जिन्हें मैंने बड़े संभालकर एक कोने में रखा था। और हाँ... मेरा पहला प्यार भी उसी बस्ते के किसी पुराने कोने में तुम्हें मिल जाएगा। ​लेकिन डरो मत, उसे देखकर ज़रा भी विचलित मत होना। क्योंकि उस पहले प्यार के छूट जाने के बाद ही तो मेरे भीतर वह जगह खाली हुई थी, जहाँ आज सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा नाम लिखा है। वो बीता हुआ कल, वो अधूरापन और वो तन्हाई... इन सबका होना ज़रूरी था, वरना मैं आज वह शख्सियत बनकर तुम्हारे सामने कैसे आता, जिसे तुम जानना चाहती हो? ​तुम बिल्कुल फ़िक्र मत करो... हम किसी भी पन्ने को पलटने की जल्दी नहीं करेंगे। जब तुम पहली बार मिलने आओगी, तो मैं अपना वो बस्ता तुम्हारे सामने रख दूँगा। हम हड़बड़ी में कोई कहानी पूरी नहीं करेंगे। ​हम धूप में बैठकर उन पुराने पन्नों से धूल हटाएंगे, कुछ किस्से मैं सुनाऊँगा, कुछ तुम सुनना। और जिस पन्ने पर मेरी आवाज़ भर आएगी, वहाँ तुम बिना कुछ कहे बस मेरा हाथ थाम लेना। मैं तुम्हारी आँखों से अपनी बीती हुई ज़िंदगी को दुबारा जी लूँगा, और तुम मेरी आँखों से मेरा अतीत देख लेना। और तुमने ठीक ही तो कहा, हम भले ही एक दूसरे के बचपन में नहीं थे, न ही उस पहली धड़कन का हिस्सा थे जब दिल ने किसी अजनबी के लिए पहली बार दस्तक दी थी... लेकिन हमारी रूहें जिस अलिखित रास्ते से चलकर यहाँ तक पहुँची हैं, वह सफर ही हमारी सबसे मुकम्मल दास्तान है। ​चलो, तय रहा... अगली मुलाक़ात में मैं अपने साथ अपना वो बस्ता भी ले आऊँगा, और अपना पूरा 'कल' तुम्हारे हवाले कर दूँगा। ​मिलते हैं, किसी अनकही कहानी के नए पन्ने पर... 🌻✨
अभी तक उससे मेरी मुलाक़ात नहीं हुई है... लेकिन जब भी वह मुझसे मिलने आएगा, मैं उससे कहूँगी कि चाहे वह मेरे लिए बिंदी, चूड़ियाँ, ओढ़नी या फूल न लाए, पर अपने साथ एक बस्ता ज़रूर लेकर आए। और उस बस्ते में भर लाए अपनी तमाम यादें... +++
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मत भूलना, लाना वो सारे बंद लिफ़ाफे, जिसमें बंद है स्मृतियां, जिसे दिया है तुम्हारे मां और बाबू जी ने, भाई-बहनों ने, सखा-सहेलियों ने, कुछ रिश्तेदारों ने... न लाना टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन लेकिन लाना तुम किस्से, कहानियां और कहावतें अपने शहर की कार, मोटरकार हम ख़ुद खरीदेंगे, तुम लाना अपने तितली वाले पंख, जिसे लगा हम उड़ जाएंगे अपने सपनों के आसमान में.. मुझे दहेज़ में चाहिए, तुम्हारा पूरा प्यार, पूरा खालीपन, तुम्हारे आत्मा के वसीयत का पूरा हिस्सा, सिर्फ़ इस जन्म का साथ तो चाहिए ही है। 🌻🌼 ~ SR ❤️
मुझे दहेज़ चाहिए, तुम लाना तीन चार ब्रीफकेस जिसमें भरे हो तुम्हारे बचपन के खिलौने, बचपन के कपड़े, बचपने की यादें, मुझे तुम्हें जानना है बहुत प्रारंभ से.. तुम लाना श्रृंगार के डिब्बे में बंद कर अपनी स्वर्ण जैसी आभा अपनी चांदी जैसी मुस्कुराहट अपनी हीरे जैसी दृढ़ता.. तुम लाना अपने साथ छोटे बड़े कई डिब्बे, जिसमें बंद हो तुम्हारी नादानियाँ, तुम्हारी खामियां, तुम्हारा चुलबुलापन, तुम्हारा बेबाकपन, तुम्हारा अल्हड़पन... तुम लाना एक बहुत बड़ा बक्सा, जिसमें भरी हो तुम्हारी खुशियां, साथ ही उसके समकक्ष वो पुराना बक्सा, जिसमें तुमने छुपा रखा है अपना दुःख, अपने ख़्वाब, अपना डर, अपने सारे राज़ अब से सब के सब मेरे होगे...
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मुझे दहेज़ चाहिए, तुम लाना तीन चार ब्रीफकेस जिसमें भरे हो तुम्हारे बचपन के खिलौने, बचपन के कपड़े, बचपने की यादें, मुझे तुम्हें जानना है बहुत प्रारंभ से.. तुम लाना श्रृंगार के डिब्बे में बंद कर अपनी स्वर्ण जैसी आभा अपनी चांदी जैसी मुस्कुराहट अपनी हीरे जैसी दृढ़ता.. तुम लाना अपने साथ छोटे बड़े कई डिब्बे, जिसमें बंद हो तुम्हारी नादानियाँ, तुम्हारी खामियां, तुम्हारा चुलबुलापन, तुम्हारा बेबाकपन, तुम्हारा अल्हड़पन... तुम लाना एक बहुत बड़ा बक्सा, जिसमें भरी हो तुम्हारी खुशियां, साथ ही उसके समकक्ष वो पुराना बक्सा, जिसमें तुमने छुपा रखा है अपना दुःख, अपने ख़्वाब, अपना डर, अपने सारे राज़ अब से सब के सब मेरे होगे...
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एक राजस्थानी कहावत है ..! जावै तो बरूजूं नई, रैवै तो या ठोड़, हंसा नै सरवर घणां, सरवर हंस किरोड़ ।। (जो जाना चाहते हो उन्हें रोकुंगा नहीं, अगर रहोगे तो आपकी मर्जी। हंस के लिर सरोवरों की कमी नहीं है और सरोवर को करोड़ों हंस मिल जाएंगे।)
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अगर कोई मुझे मेरे घर पर अकेला खाना खाते देख ले तो अपना सिर पकड़ के बैठ सकता है कि ऐसे खाना कौन खाता है भाई 🤣🤣 क्योंकि मैं अपना खाना एन्जॉय करता हूँ बहुत अच्छे से, सब घी पूरा खाया जाएगा ना हाथों पे रहेगा और ना प्लेट पे, चाहे थाली में अपना चेहरा देख ले कोई, अपना इतना साफ़ हो जाती है वो 🤣🤣🤣🤣
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मेरी पूरी ज़िंदगी का स्वभाव, मेरी बॉडी लैंग्वेज, मेरा कम बोलना... सब कुछ हमेशा से एक सीधा साधा सा रहा है, बिल्कुल नकुल जैसा। कभी किसी को दिखाने के लिए खुद को बदला नहीं, जैसी फितरत थी, वैसे ही जिए। ​लेकिन अफ़सोस वहाँ हुआ जब ज़िंदगी में ऐसी लड़कियाँ माही विज़ जैसी मिलीं.....जिन्होंने चेहरे पर हमेशा एक मीठा और मासूम होने का नाटक ओढ़े रखा, पर जैसे ही ज़रा सा मौका मिला, सबसे पहले पीठ पीछे वही बुराई करने उतरीं।
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नकुल ढुल ! 🦍
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मैं भी कहाँ तक हारूँगा... कहीं ना कही तो मेरी भी जीत लिखी होगी।
"Clerk" की भर्ती का फॉर्म भरने की सलाह दी जा रही है उस लड़के को.... जो लड़का " 4 बार " UPSC की MAINS निकाल कर घर पर " बैठा " है....
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सब कुछ मिल जाए, तो अल्फ़ाज़ नहीं बचते। थोड़ा अधूरापन ज़रूरी है, उनसे कविता बनाने के लिए। ~~हर अधूरेपन को भर दिया जाए, तो व्यक्ति रचनात्मक नहीं हो सकता। मुकम्मल ज़िंदगी में भी कविता की जगह बची रहनी चाहिए।
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आखिर में हम सब संभाल ही लेते हैं, चाहे दुख से घिरा मन हो या बिखरे हुए खुद हम हो....!!
"Clerk" की भर्ती का फॉर्म भरने की सलाह दी जा रही है उस लड़के को.... जो लड़का " 4 बार " UPSC की MAINS निकाल कर घर पर " बैठा " है....
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मा की बात याद करता हूँ, तब इस रहस्य से पर्दा उठ जाता है कि प्रेम करते हुए लोग अपने प्रेमी को ईश्वर का दर्जा क्यों देते हैं! ईश्वर, प्रेम से बनता है।💚🌻
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शायद मनुष्य का सबसे विचित्र दुख यही है कि वह जिससे कभी मुक्ति चाहता था, एक दिन उसी के बिना जीने का अभ्यस्त हो जाता है, फिर मुक्ति मिल जाने पर भी उसके भीतर कुछ छूट जाने का दुःख बना रहता है।
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हर दिन कुछ न कुछ सीखना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी बस इतना काफ़ी होता है कि जो समझ चुके हैं, उससे पीछे न हटें। यही निरंतरता चरित्र बनाती है। ~वक़्त की धूल में सब कुछ धुँधला हो, भीतर की कुछ लकीरें साफ़ रहनी चाहिए।
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एक चीज़ जो मैंने पिछले 10 सालों में बिल्कुल साफ देखी है, वह है....अगर आपके पास पैसा है, तो लोगों की वफ़ादारी ज़मीन पर पड़ी रहती है। अच्छे से अच्छे लोग आपके साथ किसी को भी Cheat करने के लिए तैयार हो जाते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका रिश्ता 5 साल का था या 10 साल का... यह कहते हुए मुझे दुख भी हो रहा है, पर इस बात में कोई शक नहीं है कि लोग बिकते हैं, बस आपको खरीदना आना चाहिए..... इतनी सी बात है।
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मैं कभी आत्मसम्मान से सौदा नहीं करता मुझसे बिछड़े लोग मेरी दुनिया में मर जाया करते हैं।
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युग बीत जाते हैं, सभ्यताएँ बदल जाती हैं, लेकिन सृष्टि का एक शाश्वत विधान कभी नहीं बदलता, समर्पण और पलायन केवल अंतहीन पीड़ा को जन्म देते हैं, जबकि संघर्ष और जीवटता से ही साम्राज्य, सम्मान और इतिहास रचे जाते हैं। "आदि से अंत तक, यही है परंपरा कायर भोगे दुख सदा, वीर भोगे वसुंधरा" संस्कृत के प्राचीन नीति ग्रंथों से उपजी यह पंक्ति मात्र शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य के अस्तित्त्व और उसके चरित्र का अंतिम निदर्शन है। कायरता केवल भयभीत होकर भाग खड़े होने का नाम नहीं है। कायरता है परिस्थितियों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर देना, अपने उत्तरदायित्वों से मुख मोड़ना और जीवन की विभीषिकाओं के आगे नतमस्तक हो जाना। जो मनुष्य संघर्ष से आँखें चुराता है, नियति उसे पग पग पर संताप और ग्लानि का दंश देती है। उसका संपूर्ण जीवन दूसरों की कृपा पर आश्रित होकर रह जाता है। इसके विपरीत, 'वीरत्व' केवल शस्त्र उठाने में निहित नहीं है। वीरत्व उस संकल्पशक्ति का नाम है जो घनघोर अंधकार में भी निष्कंप भाव से खड़ी रहती है। वीर वह है जो असफलता के प्रहारों से लहूलुहान होकर भी अपने ध्येयपथ से विचलित नहीं होता। जिसके भीतर आत्मसम्मान की ज्वाला प्रज्वलित है, जो हर विपदा को अपनी नियति बदलने का अवसर मानता है, अन्ततः यह धरा, यह वैभव और यह यश कीर्ति उसी का वरण करती है। जीवन कोई विश्रामगृह नहीं, एक अनवरत युद्धक्षेत्र है। यहाँ आपकी करुणा का मूल्य तभी है जब आपके भीतर सामर्थ्य हो, और आपका अस्तित्व तभी सार्थक है जब आपमें संताप को चीरकर निकलने का साहस हो। छाती ठोक कर खड़े होइए, भय की अरगलाओं को तोड़िए, और अपने पुरुषार्थ से अपनी नियति का मार्ग प्रशस्त कीजिए!
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"Clerk" की भर्ती का फॉर्म भरने की सलाह दी जा रही है उस लड़के को.... जो लड़का " 4 बार " UPSC की MAINS निकाल कर घर पर " बैठा " है....
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मौन में बोये गए संकल्प समय आने पर सबसे ऊँची आवाज़ बनते हैं।
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