कट्टर सेक्युलर, अपने धर्म से प्यार हैँ, बाकि हर धर्म का सम्मान हैँ

Mount Pluto, Queensland
किस किस को रोकोगे ? जवान भी सड़क पर है, और किसान भी
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मोगली जी के बारे में ऐसे मत बोलो भाई
धर्म के नाम पर नेतागीरी करने वाले सभी ढोंगियों को और दोगलो को महादेव सद्दबुद्धि दे।🙏🏻
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गटर का कीड़ा है ये
लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सारी की सारी सड़कें प्रियंका गांधी के गाल जैसी जरूर बना दूंगा : भाजपा नेता रमेश बिधूड़ी
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Criminal minded hai bc ye
scout is saying abt arishfa 'she needs sponge wala belt treatment, iski aawaaz bhi sunayi nahi degi' what a horrible violent man he is #BiggBoss20
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Ok
हुआ मेरे धर्म पर घात तो, प्रतिघात करूँगा हिंदू हूँ, हिंदुत्व की बात करूँगा 🚩
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रहने के हिसाब से दिल्ली नर्क बन चूका है
🚨 दिल्ली न्यूज़ | प्रताप विहार में बाइक खड़ी करने को लेकर विवाद युवक की मौत की खबर 📍 प्रताप विहार दिल्ली दिल्ली के प्रताप विहार इलाके में मोटरसाइकिल खड़ी करने को लेकर हुए विवाद में एक युवक की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या किए जाने का मामला सामने आया है प्राप्त जानकारी के अनुसार रविवार देर रात युवक काम से घर लौटने के बाद एक गली में अपने दोस्त से बात करने के लिए बाइक रोककर खड़ा हुआ था। इसी दौरान पार्किंग को लेकर विवाद होने की बात सामने आई है। 🔴 सवाल यह है क्या अब गली में बाइक खड़ी करने जैसे मामूली विवाद भी जानलेवा बनते जा रहे हैं? फिलहाल घटना से जुड़े सभी तथ्यों आरोपियों की स्थिति और पुलिस की आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि आवश्यक है @DelhiPolice से अनुरोध है कि मामले की निष्पक्ष जाँच कर दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए @CPDelhi @LtGovDelhi #DelhiNews #PratapVihar #DelhiPolice #ParkingDispute #DelhiCrime
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Replying to @RituRathaur
सनातन से गद्दारी अपनी संस्कृति को भ्रष्ट करना और दूसरों की पोट्टी साफ़ करना बस यही काम है इन चड्डी संघी गैंग का
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10 साल पुरानी गाड़ी प्रदूषण फैलाती है, तो 10 साल पुरानी सरकार की नीतियों की जवाबदेही कौन तय करेगा? भारत में आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई जोड़कर एक गाड़ी खरीदता है। बैंक से लोन लेता है, हर महीने किस्तें भरता है, पेट्रोल-डीजल पर टैक्स देता है, रोड टैक्स चुकाता है और फिर भी उसे अपनी गाड़ी की उम्र गिनकर चलने का हक तय करना पड़ता है! आखिर क्यों? क्या गाड़ी की उम्र ही उसके प्रदूषण का प्रमाण है? क्या 10 या 15 साल पुरानी हर गाड़ी प्रदूषण फैलाती है और क्या नई गाड़ी खरीदने वाला हर व्यक्ति पर्यावरण की रक्षा कर रहा है? अगर पुरानी गाड़ी फिटनेस टेस्ट पास करती है और तय प्रदूषण मानकों पर खरी उतरती है, तो सिर्फ उसकी उम्र के आधार पर उसे सड़क से हटाने का तर्क कितना उचित है? दुनिया के दूसरे देशों में भी पुराने वाहनों पर नियम हैं, लेकिन कई जगह वाहन की उम्र के साथ उसकी तकनीकी स्थिति, उत्सर्जन मानक और नियमित जांच को भी महत्व दिया जाता है। फिर भारत में ऐसी व्यवस्था को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती, जिसमें गाड़ी की वास्तविक हालत और प्रदूषण की जांच के आधार पर फैसला हो? सरकार से कुछ सीधे सवाल हैं: ▪️ अगर प्रदूषण रोकना मकसद है, तो सबसे पहले वाहनों से निकलने वाले धुएं की सख्त और निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होती? ▪️ जब शहरों में हवा जहरीली होती जा रही है, तो प्रदूषण के दूसरे बड़े स्रोतों पर प्रभावी नियंत्रण की जवाबदेही कौन लेगा? ▪️ जिस गाड़ी को चलाने के लिए आम आदमी ने अपनी जिंदगी के कई सालों की कमाई खर्च की, उसे बिना उसकी वास्तविक स्थिति का पर्याप्त आकलन किए सड़क से हटाने का बोझ उसी पर क्यों डाला जाए? ▪️ क्या सरकार ऐसी पारदर्शी व्यवस्था नहीं बना सकती, जिसमें फिटनेस टेस्ट और प्रदूषण जांच पास करने वाले वाहनों को निर्धारित शर्तों के साथ चलने दिया जाए? ▪️ और सबसे बड़ा सवाल—अगर किसी व्यक्ति की पुरानी गाड़ी बंद करा दी जाती है, तो नई गाड़ी खरीदने के लिए पैसा कौन देगा? क्या सरकार उस मध्यमवर्गीय परिवार की आर्थिक मजबूरी समझती है, जो बड़ी मुश्किल से अपना घरेलू बजट संभाल रहा है? पर्यावरण की रक्षा जरूरी है। स्वच्छ हवा हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन पर्यावरण संरक्षण के नाम पर बनाई गई किसी भी नीति का मूल्यांकन इस आधार पर भी होना चाहिए कि वह कितनी प्रभावी, वैज्ञानिक, पारदर्शी और आर्थिक रूप से न्यायसंगत है। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन की उम्र को आधार बनाने वाले नियमों से कितना प्रदूषण कम हुआ, उनके लागू होने की लागत आम नागरिक ने कितनी चुकाई और क्या इसके मुकाबले कम बोझ वाले विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया गया? और अगर नई गाड़ियां खरीदना ही प्रदूषण का समाधान है, तो फिर सड़क पर गाड़ियों की बढ़ती संख्या, निर्माण की पर्यावरणीय लागत और पुराने वाहनों के निपटान से पैदा होने वाली समस्याओं का हिसाब कौन देगा? यह कहना गलत होगा कि वाहन कंपनियों के साथ सरकार की मिलीभगत साबित हो चुकी है। लेकिन ऐसी नीतियों से नई गाड़ियों की मांग बढ़ सकती है, इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने फैसलों का आधार सार्वजनिक करे और किसी भी संभावित हित-संघर्ष पर पारदर्शिता बनाए रखे। आम आदमी कोई एटीएम मशीन नहीं है कि जब चाहो उससे टैक्स वसूल लो, जब चाहो उस पर नया खर्च थोप दो और जब सवाल पूछे तो उसे पर्यावरण विरोधी बता दो! प्रदूषण का समाधान चाहिए, लेकिन समाधान के नाम पर आम आदमी की जेब पर कितना बोझ डाला जाएगा, इसका जवाब भी चाहिए। अगर सरकार को स्वच्छ हवा की चिंता है, तो उसे ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें प्रदूषण फैलाने वाले वाहन पर कार्रवाई हो, चाहे वह पुराना हो या नया; और जो वाहन निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है, उसके मामले में वैज्ञानिक जांच और उचित प्रक्रिया को महत्व मिले। क्योंकि सवाल सिर्फ पुरानी गाड़ी का नहीं है—सवाल उस नागरिक के अधिकार, उसकी मेहनत की कमाई और सरकार की जवाबदेही का है, जो हर नियम का पालन करते हुए भी बार-बार नए आर्थिक बोझ का सामना करता है। #पुरानीगाड़ी #प्रदूषण #मध्यमवर्ग #सरकारीनीति #जनताकेसवाल
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आखिर हमने अपने महापुरुषों और भगवानों को भी बाँट क्यों लिया? आखिर किसने हमें इतना बाँट दिया? बचपन में स्कूल में हम बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जय भी बोलते थे, महात्मा बुद्ध की जय भी बोलते थे, महात्मा गांधी की जय भी बोलते थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू की जय भी बोलते थे। तब हमें किसी महापुरुष को सम्मान देने से पहले उसकी जाति, धर्म या विचारधारा का प्रमाणपत्र नहीं देखना पड़ता था। हमें इतना पता था कि ये सब हमारे देश के इतिहास का हिस्सा हैं, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से भारत को गढ़ने में भूमिका निभाई। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि महापुरुषों के नाम पर भी दीवारें खड़ी होने लगीं? किसी ने अंबेडकर को एक जाति तक सीमित कर दिया, किसी ने गांधी को गालियाँ देना अपनी बहादुरी समझ लिया, किसी ने नेहरू के नाम पर नफरत की दुकान खोल ली और किसी ने बुद्ध के विचारों को भी अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से देखना शुरू कर दिया। भगवान तक को राजनीतिक खेमों में बाँटने की कोशिश होने लगी। अब इंसान की पहचान उसके इंसान होने से कम और उसके धार्मिक, जातीय तथा राजनीतिक खेमे से ज्यादा तय की जाने लगी है। यह सिर्फ विचारों का मतभेद नहीं है, यह समाज के आपसी भरोसे पर हमला है। राजनीति में असहमति होनी चाहिए, नेताओं के कामकाज पर सवाल उठने चाहिए, इतिहास की आलोचनात्मक समीक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन आलोचना के नाम पर नफरत फैलाना, लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाना और महापुरुषों को राजनीतिक जागीर समझ लेना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। जब राजनीति का मकसद जनता की समस्याओं का समाधान करने के बजाय जनता को आपस में उलझाए रखना बन जाए, तब हमें सवाल जरूर पूछना चाहिए। बेरोजगारी पर सवाल पूछो तो धर्म की बहस, महँगाई पर सवाल पूछो तो जाति की बहस, शिक्षा और अस्पताल की बात करो तो किसी दूसरे मुद्दे का शोर! आखिर कब तक? सत्ता किसी भी पार्टी की हो, उससे सवाल पूछना जनता का अधिकार है। किसी पार्टी की आलोचना तथ्यों और उसके कामकाज के आधार पर होनी चाहिए, न कि अंधभक्ति या नफरत के आधार पर। लेकिन अगर किसी राजनीतिक दल की रणनीति से समाज में विभाजन बढ़ता दिखाई दे, तो उस पर सवाल उठाना भी नागरिकों की जिम्मेदारी है। याद रखिए, देश की एकता किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है और न ही कोई राजनीतिक दल देशभक्ति का अकेला ठेकेदार है। अंबेडकर सिर्फ एक जाति के नहीं, समानता और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। बुद्ध के विचार किसी एक समुदाय की जागीर नहीं हैं। गांधी और नेहरू के ऐतिहासिक योगदान पर बहस हो सकती है, उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, लेकिन इतिहास को नफरत का हथियार बनाकर आने वाली पीढ़ियों के मन में जहर भरना किसी का भला नहीं करेगा। हमारे महापुरुषों के विचारों में मतभेद रहे होंगे, उनके रास्ते अलग रहे होंगे, लेकिन आज की पीढ़ी को उनसे सीखने के बजाय उनके नाम पर आपस में लड़ना किस दिशा में ले जा रहा है? जरा सोचिए! जो लोग आपको एक-दूसरे से नफरत करना सिखा रहे हैं, क्या वे आपके बच्चों को बेहतर शिक्षा दे रहे हैं? क्या वे आपके घर का खर्च कम कर रहे हैं? क्या वे आपके लिए रोजगार पैदा कर रहे हैं? अगर इन सवालों का जवाब तलाशने के बजाय हम एक-दूसरे के भगवान, जाति और महापुरुषों से लड़ते रहेंगे, तो नुकसान हमारा होगा और राजनीतिक फायदा किसी और का हो सकता है। इसलिए अब वक्त है कि हम अपनी समझ को किसी पार्टी के प्रचार के हवाले न करें। हर दावे को परखें, हर नेता से सवाल करें और हर उस सोच का विरोध करें जो भारतीयों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाती है। हमें अपने महापुरुषों को बाँटने वाली राजनीति नहीं, उनके विचारों को समझने वाला समाज चाहिए। हमारी पहचान अलग-अलग हो सकती है, हमारी आस्थाएँ अलग हो सकती हैं, हमारी विचारधाराएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारा देश एक है और संविधान हमें समान नागरिक अधिकार देता है। याद रखिए, राजनीतिक कुर्सियाँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन समाज में बोई गई नफरत की फसल पीढ़ियों तक काटनी पड़ती है। नेताओं से सवाल पूछिए, इतिहास पढ़िए, तर्क कीजिए, असहमति रखिए—लेकिन नफरत को अपनी सोच का मालिक मत बनने दीजिए। क्योंकि जिस दिन हम अपने ही देशवासियों को दुश्मन समझने लगेंगे, उस दिन जीत किसी विचारधारा की नहीं, हमारी सामूहिक हार की होगी। जय संविधान! जय भारत! 🇮🇳 #सामाजिकएकता #जयसंविधान #महापुरुष #लोकतंत्र #नफरत_नहीं_एकता
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क्या आपके पास #आयुष्मान_कार्ड है ? अगर हाँ तो आपका अनुभव कैसा है आयुष्मान कार्ड को ले कर ? क्या आपको वैसे ही फ्री इलाज मिलता है, जैसे सरकार दावा करती है ?
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गोलगप्पे एक ऐसी चीज है, जो मै कभी भी कहीं भी और कितना भी खा सकता हूं 😋 #Golgappe #PaniPuri
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Modi is a disaster for India
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कभी दिल्ली में ऑटो चलाने का स्टाइल और उनकी गुंडागर्दी देखना, सब समझ आ जायेगा, एक पैर सीट के ऊपर पालथी मार कर ऐसे बैठते हैँ जैसे किसी रियासत के नवाब हों, उसी में एकदम से ब्रेक मारनी पड़े तो बैलेंस बनता नहीं है, और फिर ये गाडी ठोकते हैँ और लोगों को उड़ाते हैँ, दिल्ली में सैकड़ों एक्सीडेंट इन ऑटो वालों की वजह से होते हैँ, इंडिकेटर देना ये अपनी ड्यूटी समझते ही नहीं हैँ, एकदम से कहीं मोड़ देना, कहीं कट मार देना ये अपना जन्मशिद्ध अधिकार समझते हैँ
पैसे से मंहगी गाड़ी खरीदी जा सकती है, लेकिन संस्कार और तमीज नहीं! इस महिला की हरकतें देखिए – ट्रैफिक के दौरान उसकी गाड़ी ऑटो से हल्की-सी टच हो जाती है, तो मैडम अपना आपा खो बैठती हैं और गुस्से में ऑटो की लाइट, नंबर प्लेट और अन्य हिस्सों को तोड़ने लगती हैं। बेबस ऑटो चालक सामने खड़ा होकर सब कुछ सहता रहता है, जबकि महिला लगातार उसके ऑटो को नुकसान पहुँचाती रहती है। अरे मैडम जी, सड़क किसी की निजी जागीर नहीं है! सड़क पर अगर गाड़ी चलेगी तो छोटी-मोटी खरोंच लगना संभव है। अगर आप अपनी गाड़ी पर खरोंच बर्दाश्त नहीं कर सकतीं, तो उसे घर में खड़ी रखिए। गलती हुई है तो कानून के अनुसार कार्रवाई कराइए, किसी गरीब की रोजी-रोटी पर हमला करना कौन-सी अमीरी है? याद रखिए, गाड़ी की कीमत इंसान की औकात नहीं बताती, बल्कि उसका व्यवहार उसका असली चरित्र दिखाता है! (सितंबर 2026 में वायरल हुआ वीडियो)
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Wo kaun si baat thi jiske baare me love baar baar bol rahi hai Kya baune ne kambal ne niche kuchh kiya tha ? Kya baune ne love se koi commitment ki thi ?
Love Gill in full bajoing mode, Bauna is trying to escape 😂 #BiggBoss20
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भाई साहब, तुमसे और हमसे तो ज्यादा ही कमाते हैँ ये, हाँ गरीबी है कोई नकार नहीं रहा इस बात को, लेकिन 2 प्लेटफार्म जाने के लिए जब 700 रूपए की डिमांड करते हैँ तब समझ आटा है की हमारा पैसा भी हराम का थोड़ी होता है
गरीबों की हालत देखकर रोना आ गया😭 ये हाल हर रेलवे स्टेशन पर दिख जाएगा ,अब इस मोटे को देखिए किस तरह एक व्यक्ति के ऊपर सामान लाद रहा है जबकि उसके हाथ पूरे तरह भर चुके है ,व्यक्ति पर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा। खुद एक बैग भी ले जाने के लिए तैयार नहीं है ,गरीबी बहुत रुलाती है।
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Dogli hai tuntun mausi
here amrapali is clearly imitating scout giving love massage: aise shirt ke andar thha uska haath; maine bola bahar nikaal haath bahar se dabaa' my question is: WHY R THEY NOT CALLING OUT SCOUT THEN?? #BiggBoss20
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Lagta kaisa hai bc chutiya jaisa #BiggBoss20
tharkulla is soooo happy cos he has his army of chutiyas- yung, aasif n amrapali defending him all the time 🤮 #BiggBoss20
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Ye machhar aja jyada ud raha tha, first copy sala 😂 #BiggBoss20
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Unfiltered India retweeted
Love is a 100 times prettier than this Cheap aurat who defends her cheap bf while character assassinating Love Gill on national television STAY STRONG LOVE GILL #LoveGill #BiggBoss20 #BiggBoss #QaziTouqeer
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Abhi bhi sala garib hi hai ye 😂😂 #BiggBoss20
clearly the WORST person rn in the house. now he is saying 'love n scout r most brainless n senseless ppl having most useless convos' dosti ke naam pe DHABBA hai ye. kuch zyada hee udd raha wkv praises ke baad 🤢 #BiggBoss20
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Dono gay hain saale
i don't know why Yung acting as a Sautan in this Love-Scout thing !! Too Cunning and Manipulative he is !! #BB20 • #BiggBoss20
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