आखिर हमने अपने महापुरुषों और भगवानों को भी बाँट क्यों लिया? आखिर किसने हमें इतना बाँट दिया?
बचपन में स्कूल में हम बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जय भी बोलते थे, महात्मा बुद्ध की जय भी बोलते थे, महात्मा गांधी की जय भी बोलते थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू की जय भी बोलते थे।
तब हमें किसी महापुरुष को सम्मान देने से पहले उसकी जाति, धर्म या विचारधारा का प्रमाणपत्र नहीं देखना पड़ता था। हमें इतना पता था कि ये सब हमारे देश के इतिहास का हिस्सा हैं, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से भारत को गढ़ने में भूमिका निभाई।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि महापुरुषों के नाम पर भी दीवारें खड़ी होने लगीं?
किसी ने अंबेडकर को एक जाति तक सीमित कर दिया, किसी ने गांधी को गालियाँ देना अपनी बहादुरी समझ लिया, किसी ने नेहरू के नाम पर नफरत की दुकान खोल ली और किसी ने बुद्ध के विचारों को भी अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से देखना शुरू कर दिया।
भगवान तक को राजनीतिक खेमों में बाँटने की कोशिश होने लगी। अब इंसान की पहचान उसके इंसान होने से कम और उसके धार्मिक, जातीय तथा राजनीतिक खेमे से ज्यादा तय की जाने लगी है।
यह सिर्फ विचारों का मतभेद नहीं है, यह समाज के आपसी भरोसे पर हमला है।
राजनीति में असहमति होनी चाहिए, नेताओं के कामकाज पर सवाल उठने चाहिए, इतिहास की आलोचनात्मक समीक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन आलोचना के नाम पर नफरत फैलाना, लोगों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाना और महापुरुषों को राजनीतिक जागीर समझ लेना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
जब राजनीति का मकसद जनता की समस्याओं का समाधान करने के बजाय जनता को आपस में उलझाए रखना बन जाए, तब हमें सवाल जरूर पूछना चाहिए।
बेरोजगारी पर सवाल पूछो तो धर्म की बहस, महँगाई पर सवाल पूछो तो जाति की बहस, शिक्षा और अस्पताल की बात करो तो किसी दूसरे मुद्दे का शोर! आखिर कब तक?
सत्ता किसी भी पार्टी की हो, उससे सवाल पूछना जनता का अधिकार है। किसी पार्टी की आलोचना तथ्यों और उसके कामकाज के आधार पर होनी चाहिए, न कि अंधभक्ति या नफरत के आधार पर। लेकिन अगर किसी राजनीतिक दल की रणनीति से समाज में विभाजन बढ़ता दिखाई दे, तो उस पर सवाल उठाना भी नागरिकों की जिम्मेदारी है।
याद रखिए, देश की एकता किसी पार्टी की संपत्ति नहीं है और न ही कोई राजनीतिक दल देशभक्ति का अकेला ठेकेदार है।
अंबेडकर सिर्फ एक जाति के नहीं, समानता और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई के महत्वपूर्ण प्रतीक हैं। बुद्ध के विचार किसी एक समुदाय की जागीर नहीं हैं। गांधी और नेहरू के ऐतिहासिक योगदान पर बहस हो सकती है, उनकी नीतियों की आलोचना हो सकती है, लेकिन इतिहास को नफरत का हथियार बनाकर आने वाली पीढ़ियों के मन में जहर भरना किसी का भला नहीं करेगा।
हमारे महापुरुषों के विचारों में मतभेद रहे होंगे, उनके रास्ते अलग रहे होंगे, लेकिन आज की पीढ़ी को उनसे सीखने के बजाय उनके नाम पर आपस में लड़ना किस दिशा में ले जा रहा है?
जरा सोचिए! जो लोग आपको एक-दूसरे से नफरत करना सिखा रहे हैं, क्या वे आपके बच्चों को बेहतर शिक्षा दे रहे हैं? क्या वे आपके घर का खर्च कम कर रहे हैं? क्या वे आपके लिए रोजगार पैदा कर रहे हैं?
अगर इन सवालों का जवाब तलाशने के बजाय हम एक-दूसरे के भगवान, जाति और महापुरुषों से लड़ते रहेंगे, तो नुकसान हमारा होगा और राजनीतिक फायदा किसी और का हो सकता है।
इसलिए अब वक्त है कि हम अपनी समझ को किसी पार्टी के प्रचार के हवाले न करें। हर दावे को परखें, हर नेता से सवाल करें और हर उस सोच का विरोध करें जो भारतीयों को एक-दूसरे का दुश्मन बनाती है।
हमें अपने महापुरुषों को बाँटने वाली राजनीति नहीं, उनके विचारों को समझने वाला समाज चाहिए।
हमारी पहचान अलग-अलग हो सकती है, हमारी आस्थाएँ अलग हो सकती हैं, हमारी विचारधाराएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन हमारा देश एक है और संविधान हमें समान नागरिक अधिकार देता है।
याद रखिए, राजनीतिक कुर्सियाँ आती-जाती रहती हैं, लेकिन समाज में बोई गई नफरत की फसल पीढ़ियों तक काटनी पड़ती है।
नेताओं से सवाल पूछिए, इतिहास पढ़िए, तर्क कीजिए, असहमति रखिए—लेकिन नफरत को अपनी सोच का मालिक मत बनने दीजिए।
क्योंकि जिस दिन हम अपने ही देशवासियों को दुश्मन समझने लगेंगे, उस दिन जीत किसी विचारधारा की नहीं, हमारी सामूहिक हार की होगी।
जय संविधान! जय भारत! 🇮🇳
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