मैंने दो कॉमेडियन्स का वीडियो देखा, हँसी ढूँढ़ता रहा, मसखरी दिखाई दी,
सटायर ढूँढता रहा, संवेदन-शून्यता दिखायी दी.
परिहास ढूँढता रहा, बदतमीज़ी दिखाई दी.
एक वृद्ध महिला को कुर्सी और आदर देना अगर मज़ाक़ का विषय है, तो ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मैं आजीवन मज़ाक़ बन के जीता रहूँ और एक दिन मज़ाक़ बनके ही इस निर्मम दुनिया से चला जाऊँ.
विरोध करना लोकतांत्रिक-अधिकार है, लेकिन मर्यादा से गिरना चारित्रिक-पतन है.
परमात्मा मुझे वो दिन न दिखाए कि मैं अपने महान भारतवर्ष में कभी जोकर-राज देखूँ.
मेरे बच्चों, जेन ज़ी के चिराग़ों, हँसने के लिए बीरबल के चुटकुले पढ़ लेना, पंचतंत्र की कहानियाँ पढ़ लेना, तेनालीराम के किस्से पढ़ लेना, लेकिन ऐसे भावना-शून्य जोकरों को अपनी मोबाइल स्क्रीन पर जगह देकर, अपने माता-पिता की परवरिश को लज्जित मत करना. जीते रहो!