मोहन यादव को आज उनकी संपत्ति को लेकर ट्रोल किया जा रहा है, लेकिन एक सवाल का जवाब कोई नहीं देता क्या उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार जमीन खरीदी है? उनके चुनावी हलफनामे बताते हैं कि वे मुख्यमंत्री बनने से बहुत पहले से संपत्ति और कारोबार रखते थे, और आज भी अगर कोई व्यक्ति कानूनी तरीके से जमीन खरीदता है तो उसमें दिक्कत क्या है?
और अगर नेताओं की जमीन खरीदने-बेचने पर ही बहस होनी है, तो फिर यह बहस सबके लिए समान होनी चाहिए। दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों या बड़े नेताओं की संपत्तियों और जमीन खरीदने की खबरों पर इतनी बेचैनी क्यों नहीं दिखाई देती? चर्चा सिर्फ एक ही नाम पर क्यों सिमट जाती है?
असल परेशानी जमीन नहीं, "यादव" उपनाम है।
यही वजह है कि मोहन यादव को भी निशाना बनाया जा रहा है और उनके समर्थन में पोस्ट लिखने पर
@JaikyYadav16 को भी ट्रोल किया जा रहा है। मानो किसी यादव का दूसरे यादव के समर्थन में खड़ा होना ही कुछ लोगों को स्वीकार नहीं है।
जैकी यादव ने सिर्फ इतना कहा कि आलोचना तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं। लेकिन कुछ लोगों को हर बहस का निष्कर्ष पहले से तय चाहिए कटघरे में यादव ही खड़ा दिखना चाहिए।
असहमति रखिए, सवाल पूछिए, लेकिन किसी को सिर्फ उसके "यादव" होने की वजह से निशाना बनाना राजनीति नहीं, पूर्वाग्रह है।