इंसान की कमाई के लिए कब तक बेजुबान दर्द सहेंगे?
आसमान से बारिश नहीं, ओले बरस रहे हैं… और ये बेजुबान घोड़े खुले आसमान के नीचे ठंड और दर्द सहने को मजबूर हैं।
जिन घोड़ों की मेहनत से मालिक की रोज़ी-रोटी चलती है, क्या उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मालिक की नहीं है?
जब ये कमाकर देते हैं, तब अपने लगते हैं… तो मुसीबत में इन्हें अकेला क्यों छोड़ दिया जाता है?
इनकी भी जान है, इन्हें भी दर्द होता है। ये बोलकर अपना दुख नहीं बता सकते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इनका दर्द महसूस न किया जाए।
थोड़ी कमाई कम हो जाए तो कोई बात नहीं, लेकिन इन बेजुबानों की जान और तकलीफ को नज़रअंदाज़ मत कीजिए।
इंसानियत सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, इन बेजुबानों के लिए भी होनी चाहिए।