आम हिंदुस्तानियों के मताधिकार और लोकतंत्र के लुटेरे ज्ञानेश कुमार की बेटी और डीएम नोएडा के केस का रोस्टर यूँही नहीं बदला गया। जो कुछ नज़र आ रहा है उसके बिनाह पर यह साफ़ कहा जा सकता है कि ज्ञानेश कुमार ने अपनी बेटी पर जुर्माने की कार्रवाई से उसे साफ़ निकालने के लिए सिद्धार्थ शर्मा की सेवाएं ली जो सुप्रीम कोर्ट के जज सतीश चंद्र शर्मा का बेटा है।
निरपराध युवाओं, छात्रों, मजदूरों के उत्पीड़न, गिरफ्तारी की आरोपी मेघा रूपम को राहत देने के लिए देश के सीजेआई सूर्यकांत को विश्वास में लिया गया। भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचाने के शौक़ीन सीजेआई ने बिना किसी हिचकिचाहट के रोस्टर बदल दिया। यह जानते हुए भी कि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का बेटा चुनाव आयोग का वकील है और मेघा रूपम यानि वादी का पिता मुख्य चुनाव आयुक्त है। जबकि यह मामला सीधे सीधे कान्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंट्रेस्ट का था।
लाइव लॉ के संपादक मनु सेबेस्टियन के कुछ सवाल महत्वपूर्ण हैं। वो कहते हैं
सवाल केवल यह नहीं है कि किसी मामले में जज का निर्णय वास्तव में उनके पारिवारिक पेशेवर संबंध से प्रभावित हुआ या नहीं, बल्कि यह भी है कि परिस्थितियां किसी निष्पक्ष पर्यवेक्षक को संभावित हितों के टकराव की आशंका पैदा करती हैं या नहीं?
कानूनी व्यवस्था में यह सिद्धांत लंबे समय से दोहराया जाता रहा है कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। क्या इस मामले में ऐसा हुआ?
इसी संदर्भ में यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब किसी जज का बेटा चुनाव आयोग का वकील हो, तब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून को चुनौती देने वाले मामले और मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी से जुड़े मामले की सुनवाई में न्यायिक औचित्य को लेकर क्या अतिरिक्त सावधानी अपेक्षित नहीं थी?