मैंने अपनी जिंदगी की सारी जमा-पूँजी लगाकर ₹35 लाख में एक प्लॉट खरीदा और उस पर अपना घर बनवाना शुरू किया।
नींव पड़ चुकी थी, दीवारें भी आधी बन गई थीं। तभी एक दिन मेरा पड़ोसी आया और मजदूरों को काम रोकने के लिए कहने लगा।
मैंने पूछा, “भाई साहब, क्या हुआ? आप काम क्यों रुकवा रहे हैं?”
वह अकड़कर बोला—
“तुम्हारी दीवार मेरी जमीन में आ रही है। इसे अभी तोड़ो, वरना मैं तुम्हें घर नहीं बनाने दूँगा!”
मैंने अपनी जमीन के कागजात दिखाए, लेकिन वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था।
उसने अगले ही दिन अपने कुछ लोगों को बुला लिया और मेरी बन रही दीवार के सामने ईंटें रखवा दीं, ताकि मजदूर काम न कर सकें।
मैंने समझाने की कोशिश की, तो उसने धमकी देते हुए कहा—
“यहाँ रहना है तो मेरे हिसाब से रहना पड़ेगा। मोहल्ले में मेरी चलती है!”
मैंने पुलिस को बुलाने की बात कही, तो वह हँसकर बोला—
“पुलिस भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती!”
उस रात मैं परेशान होकर अपने कागजात देखने लगा। तभी मेरी नजर जमीन के नक्शे पर पड़ी।
मुझे एक ऐसी चीज दिखाई दी, जिसने पूरे मामले को पलट दिया।
अगली सुबह मैं सीधे अमीन को लेकर जमीन की नापी करवाने पहुँचा। पड़ोसी को लगा कि इस बार भी वह मुझे डरा देगा, लेकिन नापी शुरू होते ही उसका चेहरा उतर गया।
अमीन ने सबके सामने कहा—
“गलती इनके घर में नहीं, बल्कि आपके बनाए हुए निर्माण में है!”
लेकिन तभी पड़ोसी ने एक पुराना कागज निकालकर दिखाया और दावा किया कि असली गलती अमीन की है।
अब सवाल था—क्या पड़ोसी सच में मेरी जमीन हड़पना चाहता था, या उसके पास कोई ऐसा सबूत था जो मेरा घर तुड़वा सकता था?
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