अमित शाह जी का जन्म पूनम( पूर्णिमा) के दिन हुआ, इसलिए घर में उन्हें पूनम कहकर बुलाया जाता था। कांग्रेस इसी का मज़ाक उड़ाकर कह रही है कि पूनम से डरने की ज़रूरत नहीं। इससे दो बातें झलकती हैं - पहली, महिलाओं से जुड़े नाम को कमज़ोरी का प्रतीक समझने वाली मानसिकता; दूसरी, भारत की ज़मीनी परंपराओं से पूरी तरह कटा हुआ राजनीतिक अहंकार।
भारत के गाँवों में जन्म के दिन, वार, तिथि और त्योहार के आधार पर नाम रखना कोई नई बात नहीं। मंगलवार को जन्मा तो मंगलू, बुधवार को जन्मा तो बुध्दू, वीरवार को जन्मा तो वीरू; जन्माष्टमी पर जन्मा तो कृष्ण, गोवर्धन पर जन्मा तो गोधू। ये नाम किसी की कमज़ोरी या मज़ाक़ का विषय नहीं, परिवार के अपनत्व, लोकजीवन और सांस्कृतिक परंपरा की पहचान हैं।
लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस को भारत की इन सहज परंपराओं का एहसास हो भी कैसे? भारत को समझने के लिए गाँव-देहात, हिंदुस्तान की मिट्टी, घर-परिवार की बोली और लोकजीवन से जुड़ना पड़ता है। सिर्फ़ भारत में राजनीतिक टूरिज्म कर लेने से भारत की आत्मा नहीं समझ आती।
आख़िर Antonio और Raul Vinci वाली परंपरा में पले-बढ़े लोग भारत की मिट्टी से निकले नामों और संस्कारों को समझेंगे भी कैसे।
किसी का नाम उड़ाकर कांग्रेस अमित शाह जी का नहीं, अपनी भारत से कटी हुई सोच का मज़ाक बना रही है।
वैसे आज पूनम तो नहीं मगर पूनम की रात जैसा सुंदर माहौल जरूर हो रहा है माता रानी के मेले में। 🙏🏽