पत्रकार और लेखक।राजनीति पर ख़बरें सुनता और सुनाता हूँ।एक्स - इंडिया टुडे, राजस्थान पत्रिका. राजनीति पर सात किताबें प्रकाशित.

New Delhi
उत्तरप्रदेश से भाजपा के अरूण सिंह,गीता उर्फ चन्द्रप्रभा,नीरज शेखर,बृजलाल,बीएल वर्मा,सीमा दिवेदी, और हरदीप पुरी का राज्यसभा कार्यकाल खत्म हो रहा हैं। दिनेश शर्मा के अंडमान ​और निकोबार द्धीप समू​ह के उपराज्यपाल बनने के बाद उनकी सीट खाली है। मोदी सरकार के दो मंत्री हरदीप पुरी और बीएल वर्मा को मंत्री बने रहने के लिए फिर से राज्यसभा जाना होगा।ओबीसी समुदाय से आने वाले बीएल वर्मा को यूपी चुनाव को देखते हुए फिर से राज्यसभा भेजा जा सकता है,लेकिन 74 वर्षीय मंत्री हरदीप पुरी की संभावना कम हैं। यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे बृजलाल के दलित पृष्ठभूमि के होने के कारण फिर से राज्यसभा जाने के प्रबल दावेदार हैं।बृजलाल उत्तरप्रदेश अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। दो महिला राज्यसभा सांसदों का भी कार्यकाल खत्म हो रहा हैं।सीमा द्विवेदी ब्राम्हण चेहरा तो गीता चंद्रप्रभा ओबीसी चेहरा हैं।दोनों महिला नेता विधानसभा चुनाव लड़ सकती है। सीमा द्विवेदी तीन बार विधायक रह चुकी है।कभी सपा में रही और भाजपा में आकर राज्यसभा सांसद तक का सफर करने वाली गीता शाक्य उर्फ गीता चंद्रप्रभा ओबीसी समुदाय से हैं और उत्तरप्रदेश बीजेपी महिला मोर्चा की अध्यक्ष रह चुकी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे और राजपूत समुदाय से आने वाले नीरज शेखर का फिर से राज्यसभा भेजने को लेकर बीजेपी दुविधा में हैं। नीरज शेखर फिर से राज्यसभा जाने के इच्छुक हैं। पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अरूण सिंह को राज्यसभा नहीं भेजा जाएगा।हालांकि उन्होंने सारे घोड़े खोल दिए हैं। राष्ट्रीय महासचिव बने हरीश द्धिवेदी और स्मृति ईरानी यूपी से राज्यसभा के प्रबल दावेदार हैं।दोनों नेता 2024 का लोकसभा चुनाव हार गए थे। सबसे ज़्यादा चर्चा स्मृति ईरानी को लेकर है कि वह राज्यसभा जाएगी या यूपी से विधानसभा चुनाव लड़ेंगी। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव,जातिगत समीकरण और भविष्य में मोदी कैबिनेट को ध्यान में रखकर यूपी से राज्यसभा के नाम बीजेपी तय कर सकती हैं।
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चंपत राय के अहंकार, तानाशाही भरे व्यवहार, किसी को कुछ ना समझने और राम मंदिर को अपनी निजी जागीर समझकर व्यवहार करने के कारण हिंदू समाज को जो घाव लगा था,वहीं घाव मुख्य चुनाव आयुक्त के अहंकार,तानाशाही से भरे व्यवहार,किसी को कुछ ना समझने और चुनाव आयोग को अपनी निजी जागीर की तरह चलाने के कारण देश के लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया को लगा है। देश का ज़िम्मेदार और जागरूक नागरिक होने के साथ लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का प्रबल समर्थक होने के कारण मैं समीर चौगाँवकर ज्ञानेश कुमार को पद से मुक्त करने का समर्थन करता हूँ। राम मंदिर से चंपत चले गए,चुनाव आयोग के चंपत ज्ञानेश कुमार को भी जाना होगा।
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इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार रितिका चोपड़ा की इस खोजी खबर ने तहलका मचाया हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस जैसा अखबार, राजकमल झा जैसा संपादक का साथ हो तो रितिका चोपड़ा जैसे पत्रकारों को ऐसी खबर करने की हिम्मत मिलती है। सरकार का भोजन और भजन करने में ही जीवन को धन्य समझने वाले थोड़ा आत्म चिंतन करे। सरकार को इस खबर पर जाँच करनी चाहिए, मुख्य चुनाव आयुक्त में थोड़ी भी शर्म होगी तो तत्काल नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना चाहिए। @RitikaChopra__ @rajkamaljha @IndianExpress को बधाई।
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उत्तरप्रदेश की दस,उत्तराखंड और बंगाल की एक—एक सीट पर राज्यसभा का चुनाव 16 अक्टूबर को होगा। उत्तरप्रदेश के इस राज्यसभा चुनाव के साथ ही बहुजन समाज पार्टी अपनी स्थापना के 37 साल बाद चारों सदनों विधानसभा,विधान परिषद,लोकसभा और राज्यसभा में ‘शून्य’ हो जाएगी। यूपी विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का 5 अगस्त को निधन हो गया था।विधान परिषद में बहुजन समाज पार्टी के एकमात्र सदस्य भीमराव अंबेडकर का कार्यकाल 2024 में पूरा हो गया है।2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खाता तक नहीं खुला था। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के कारण 2020 में सपा के सहयोग से बहुजन समाज पार्टी के रामजी गौतम राज्यसभा के लिए चुने गए थे।अब उनका भी कार्यकाल खत्म हो रहा हैं। 37 साल बाद ब​​हुजन समाज पार्टी का चारों सदनों में कोई सदस्य नहीं होगा। 2007 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में 206 विधायकों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी दो दशक बाद उत्तरप्रदेश और देश की राजनीति से पूरी तरह बाहर हो गई हैं।कुछ ही महीनों बाद यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं।मायावती कोई चमत्कार करेगी,इसकी कोई उम्मीद नहीं है। क्या मायावती किसी के साथ गठबंधन करेगी या अकेले ही मैदान में उतरेगी? आने वाले दिनों में इसका जवाब मिल जाएगा। उत्तरप्रदेश चुनाव में दो गठबंधन ही आमने सामने होंगे।एक का नेतृत्व योगी करेंगे और दूसरे का नेतृत्व अखिलेश यादव करेंगे।फिलहाल उत्तरप्रदेश में किसी तीसरे मोर्चे की कोई संभावना नहीं है।मायावती,ओवेसी और अन्य छोटे छोटे दलों ने मिलकर बना भी लिया तो उसका कोई बड़ा असर होगा,ऐसा नजर नहीं आता। कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी को मायावती ने अपने अहंकार,तानाशाही और भयंकर भ्रष्ट्राचार के कारण खत्म कर दिया हैं।मायावती बसपा को न परिवार की पार्टी बना सकी और ना आम बहुजन समाज की आवाज बना सकी।बहुजन समाज पार्टी को मायावती ने राख में मिला दिया है। बहुजन समाज पार्टी का इतिहास ही बचा रहेगा,भविष्य नहीं।
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"यूं ही आबाद रहेगी दुनिया हम ना होंगे तो हम सा कोई होगा"
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पीएम मोदी पाँच दिन पहले 17 सिंतबर को 76 साल के हो गए। 2029 के लोकसभा चुनाव के वक्त मोदी लगातार 15 साल प्रधानमंत्री रहते हुए 79 साल के होंगे। तय है 2029 लोकसभा चुनाव तक मोदी पीएम बने रहेंगे और यह भी तय है कि 2029 का लोकसभा चुनाव बीजेपी मोदी के नाम पर लड़ेगी।2029 के लोकसभा चुनाव का परिणाम क्या होगा,अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।इसका आकलन चुनाव के वक़्त की राजनीतिक स्थिति देखकर किया जाएगा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर बीजेपी 2029 का लोकसभा चुनाव जीतती है तो क्या मोदी ही पीएम बनेंगे, या किसी नए चेहरे को मौक़ा मिलेगा, या मोदी दो साल पीएम रहकर 2031 में किसी और के लिए कुर्सी खाली कर देंगे? या मोदी पूरे पाँच साल 2034 तक पीएम बने रहेंगे? यदि मोदी 2029 का आम चुनाव जीत कर पूरे पाँच साल देश के प्रधानमंत्री बने रहते है तो 2034 के लोकसभा चुनाव के समय मोदी की उम्र 84 साल हो जाएगी।ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है क्या 84 साल की उम्र के बाद भी मोदी प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे या 2034 के आम चुनाव में बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री का कोई नया नाम होगा? अमित शाह 2034 के लोकसभा चुनाव के वक्त 70 साल के हो जाएगे।योगी आदित्यनाथ 2034 के लोकसभा चुनाव के समय 62 साल और देवेन्द्र फड़नवीस 64 साल के होंगे।2034 लोकसभा चुनाव के वक्त राहुल गांधी 64 साल के होंगे। राहुल गांधी मोदी से 20 साल छोटे है।अमित शाह राहुल गांधी से 6 साल बढ़े हैं।योगी आदित्यनाथ राहुल से 2 साल छोटे है और देवेंन्द्र फड़नवीस राहुल गांधी के बराबर है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह हैं कि 2034 में राहुल गांधी के सामने क्या अमित शाह होंगे,या योगी आदित्यनाथ या देवेन्द्र फड़नवीस होंगे? कांग्रेस से राहुल ही होंगे लेकिन बीजेपी से कौन होगा,यह अभी तय नहीं है। यदि 2029 का आम चुनाव बीजेपी हारती है तो भी मोदी का विकल्प कौन होगा, यह पाँच साल विपक्ष में रहकर बीजेपी 2034 के चुनाव के समय तय करेगी। मतलब साफ़ है कि बीजेपी 2029 का आम चुनाव जीते या हारे मोदी के बाद बीजेपी में मोदी की जगह कौन लेंगा,इसके लिए 2034 तक इंतिज़ार करना होगा।
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Must watch with @PadmajaJoshi
#PoliticsZindabad debuts this week. Pure politics. Every Friday 8 pm A special launch episode today, where we talk of IIT Bombay, DUSU, Chhatron ki Goonj and a bulldozer welcome in Uttar Pradesh.
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कांग्रेस के ए​​क वरिष्ठ नेता ने निजी बातचीत में कहा ​कि राहुल गांधी कांग्रेस को फिर से खड़ा करने के लिए खूब मेहनत कर रहें हैं और एक दिन कांग्रेस के गौरवशाली दिन वापस दिला देंगे। मैंने अपने कांग्रेस के नेता मित्र को बातचीत में गंभीरता से सुना।एक नेता के अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उम्मीद करने में कुछ भी गलत नहीं हैं,लेकिन क्या राहुल गांधी कांग्रेस की बीमारी समझे बिना उसका इलाज करने की को​शिश कर रहे हैं? राहुल गांधी कांग्रेस की मार्केटिंग और प्रचार प्रसार करने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं।लेकिन मुझे लगता है कि आज के कांग्रेस की स्थिति एंबेसडर मॉडल की कार की तरह हो गई हैं।ए​क समय देश में एंबेसडर कार के अलावा कोई दूसरी कार दिखती नहीं थी।नेताओं के शान की सवारी एंबेसडर कार हुआ करती थी।एंबेसडर कार को चुनौती देने वाला कोई नहीं था।एंबेसडर कार का भारतीय बाजार में एकछत्र राज था और दशकों तक एंबेसडर कार शासन तंत्र की वैसी ही प्रतीक थी जैसी कभी कांग्रेस दशकों तक भारतीय राजनीति​ का प्रतीक रही। समय बदला और कार के मार्केट में नए नए खिलाड़ी और ब्रांड आ गए।मारुति कार ने एंबेसडर कार के दबदबे को तोड़ना शुरू किया और फिर बाद में हुंडई,टोयोटा,महिंद्रा और टाटा ने एंबेसडर कार के हिस्से को अपने हिस्से में बदल दिया। जैसे एंबेसडर कार के बाजार में एकछत्र राज से बाहर हो गई,वैसे ही पूरानी ढर्रे वाली कांग्रेस को राजनीति दलों के नए नए ब्रांडों ने देश की राजनीति से बेदखल करना शुरू कर दिया। भारतीय राजनीति में वही टिका रहेंगा जो जरूरत के हिसाब से निरंतर बदलता रहेगा और नयापन लाता रहेगा। कांग्रेस के लिए आगे का रास्ता वही है जो एंबेसडर के निर्माताओं के सामने रहा होगा।कांग्रेस को राहुल गांधी अब 'नया, बेहतर और परिवर्तित' मॉडल देकर ही बीजेपी के सामने चुनौती के रूप में पेश कर सकते हैं। भाजपा ने भी समय के साथ साथ अपने आप को बदला।1980 में बनी भाजपा ने अटल आड़वाणी के दशक की भाजपा के बाद अपना पूरा कायाकल्प कर मोदी शाह की भाजपा में अपने आप को परिवर्तित कर लिया। कभी बनिया,ब्राम्हण की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी ने बनिया और ब्राम्हणों के साथ एससी,एसटी और ओबीसी को अपने साथ जोड़ लिया।दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ लेने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई।भाजपा ने सत्ता के लिए 'चाल,चरित्र और चेहरा'का मुखौटा उतार फेका और आज देश की राजनीति में सबसे बड़ी ताकत बन गई।वही दूसरी तरफ कांग्रेस मुसलमान से बाहर नहीं निकल सकी। राहुल गांधी और कांग्रेस को यह समझना होगा कि जब तक आप चुनौती की गंभीरता को कबूल नहीं करेंगे तब तक आप गंभीर आत्म-विश्लेषण कैसे करेंगे? कांग्रेस सोशल मीडिया पर अपनी अपराजेयता और अपरिहार्यता के दावे भले ही करते रहे,इससे चुनाव नहीं जीते जाते। समय बदलाव की मांग कर रहा हैं।कांग्रेस को अपना एक नया ब्रांड बनाना ही पडेगा। जब तक राहुल और कांग्रेस इस बात को नहीं समझेंगे तब तक सत्ता के लिए संघर्ष करते रहेंगे और भाजपा की राह आसान करते रहेंगे।
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“शनिवार की शाम,किताबों के नाम”। कल समय निकालकर किताबें खरीदने ख़ान मार्केट गया था।थोक में मनपसंद किताबें ख़रीदी।एक साथ 15-20 किताबें ख़रीदने का एक कारण यह भी है कि अपने दिल के क़रीब मित्रों को मैं अपनी लिखी या ख़रीदी हुई किताबें तोहफ़े में देना पसंद करता हूँ।मित्र भी मुझें किताबें गिफ्ट करते रहते हैं। किताबों से मुझें बहुत मोह है,इस मोह से मुक्त नहीं होना चाहता हूँ।
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पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम उप चुनाव में ममता बनर्जी की प्रत्याशी संचिता डे के सीएम शुभेंदु अधिकारी से मुलाक़ात के बाद नामांकन वापस लेना सामान्य घटना नहीं है। ममता बनर्जी ने बंगाल में भय, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र को कुचलने की सारी हदें पार कीं थीं,इसलिए बंगाल की जनता ने लोकतंत्र बचाने की लड़ाई बीजेपी के साथ कंधे से कंधे मिलाकर लड़ी और ममता को सत्ता से बाहर कर दिया। ममता के नेतृत्व में डेढ़ दशक से ज़्यादा बंगाल को लूटने वाले और आम बंगाली का खून चूसने वाले विधायकों और सांसदों ने रातो रात पाला बदला और बीजेपी के छतरी के नीचे आ गए। बीजेपी सरकार आने पर जिन्हें हवालात में होना चाहिए था,वे सब बीजेपी के साथ हलवा खा रहे हैं।जिनके ख़िलाफ़ बीजेपी लड़ी आज सत्ता में आने के बाद उन्ही के साथ खड़ी है। कोलकाता के पूर्व मेयर फिरहाद हाकिम,जिसने कोलकत्ता को मिनी पाकिस्तान बनाने की क़सम खाई थी।जिस फिरहाद हाकिम ने बकरों के समान संघ के प्रचारकों की गर्दन काटने की धमकी दी थी,आज वही फिरहाद हाकिम अपनी अकूत अवैध कमाई को बीजेपी के देख रेख में वैध कर रहा है। राजनीतिक रूप से लगभग खत्म हो चुकी ममता के उम्मीदवार को सीएम शुभेंदु अधिकारी की बेहद मजबूत सीट से हराना बीजेपी के लिए क्या इतना मुश्किल था कि उम्मीदवार को डर और प्रलोभन देकर चुनाव से बाहर करवा दिया? ममता के पास ना सत्ता है, ना पार्टी है,ना विधायक है, ना सांसद है, ना कैडर है, ना सहयोगी दलों का समर्थन है,ना चुनाव लड़ने के लिए पैसे है, फिर भी बीजेपी सीएम के घर में एक चुनाव लड़ने की हिम्मत क्यो नहीं जुटा पाई? सीएम शुभेंदु अधिकारी ख़ुद विपक्ष में रहते सीएम ममता बनर्जी को इस नंदीग्राम सीट से हरा चुके हैं।जब ममता के पास सबकुछ था, तब ममता ख़ुद नंदीग्राम से हार गई थीं, आज ममता के पास कुछ नहीं है तो कैसे सत्ता पर काबिज बीजेपी को ममता का प्यादा हरा देता? बीजेपी को चुनाव लड़ना था और नंदीग्राम के संग्राम में ममता को फिर हराना था। बीजेपी लोकतांत्रिक पार्टी है।बीजेपी को यह समझना चाहिए कि लोकतंत्र में चुनाव सर्वोपरि है।ख़ुद लड़े और सबको लड़ने दे। लोकतंत्र में जनता का फ़ैसला अंतिम और सर्वमान्य होता है। लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई सबसे ज़्यादा बीजेपी ने लड़ी है। ममता को राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए लोकतंत्र को खत्म करने या देश को नंदीग्राम जैसे चुनाव से मुक्त करने की जरूरत नहीं है।
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Apart from the usual distribution of organisational berths to poll going states, caste groups, & other demographics of sex and age, the new team reflects @BJP4India ‘s attempts at a reset as the exigencies of three terms in power kick in, with all the pieties of the past and the anxieties of the future” -@nistula 👌
“Apart from the usual distribution of organisational berths to poll going states, caste groups, & other demographics of sex and age, the new team reflects @BJP4India ‘s attempts at a reset as the exigencies of three terms in power kick in, with all the pieties of the past and the anxieties of the future” - thehindu.com/news/national/t…
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एक युवा नेता धूमकेतु के समान भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में उभरा।यह युवा नेता बहुत जल्दी एक कार्यकर्ता से उप मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गया।एक से बढ़कर एक दिग्गज नेताओं से भरे उस राज्य में इस युवा नेता का तेजी से उदय अचंभित और आश्चर्यचकित करने वाला था।इस युवा नेता को भविष्य का मुख्यमंत्री कहा जाने लगा। खबर है कि उप मुख्यमंत्री फ़ैसले मुख्यमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व को नजर अंदाज़ कर लेने लगे थे।उप मुख्यमंत्री की टोली भी उप मुख्यमंत्री के मुख्यमंत्री बनने की बाते सार्वजनिक करने लगी थी।उप मुख्यमंत्री के व्यवहार में भविष्य के मुख्यमंत्री का व्यवहार परिलक्षित होने लगा था।उप मुख्यमंत्री का व्यवहार मुख्यमंत्री को खटक रहा था।मुख्यमंत्री को उप मुख्यमंत्री का व्यवहार नागवार गुज़रा। सुना है मुख्यमंत्री जब दिल्ली आए थे तो साथ में एक फाइल लेकर आए थे, बस इसी फाइल ने उप मुख्यमंत्री का मौक़ा,मौसम और माहौल ख़राब कर दिया। खबर है कि ऊंची उड़ान के लिए अपने राजनीतिक पंख को फैला रहे इस उप मुख्यमंत्री के पर फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व ने कतर दिए हैं।फिलहाल इस उप मुख्यमंत्री के सितारे गर्दिश में हैं।
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Home minister @AmitShah ‘s announcement of a deadline of 2029 for the 21 NDA ruled states to implement a Uniform Civil Code is full of political implications. To know what these implications are, do watch “Talking Politics” this week - @nistula piped.video/TcL4DDylRL8?si… via @YouTube
Home minister @AmitShah ‘s announcement of a deadline of 2029 for the 21 NDA ruled states to implement a Uniform Civil Code is full of political implications. To know what these implications are, do watch “Talking Politics” this week - piped.video/TcL4DDylRL8?si=x6EL… via @YouTube
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आज प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी का जन्मदिन हैं। नरेंन्द्र मोदी भारतीय राजनीति में सियासत के सिंकदर हैं। नरेंन्द्र मोदी ​के उम्मीद की राजनीति ने संभ्रम और भुलावे की राजनीति पर जीत हासिल की है।मोदी की राजनीति ने वंशवाद की राजनीति को हराया है और हतोत्साहित भी किया हैं।मोदी के आशा ने देश की राजनीति में घर कर गई निराशा को भगाया है।ऐसा कहा जा सकता है कि अब भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में अपनी सामूहि​​क अपेक्षाओं का मूर्त रूप पा लिया हैं। निराशा,अपराध,परिवारवाद और भ्रष्ट्राचार में घुट रहे भारत ने 2014 में अपना विश्वास,अपनी आस्था और अपना भरोसा एक संघ प्रचारक और कभी रेल्वे स्टेशन पर चाय बेचने वाले को सौप दिया था।मोदी ने देश की जनता को कभी निराश नहीं किया और जनता ने भी मोदी का भरपूर साथ दिया।मोदी ने बताया किसरकार का मतलब सामर्थ्य,समर्पण और संकल्पों की नई उर्जा हैं।मोदी ने देव से देश और राम से राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त किया हैं। मोदी प्रधानमंत्री के रूप में अपने 12 साल में यथास्थिति के प्रति समग्र इनकार का प्रतीक बनकर उभरे हैं।2014 के बाद देश के चुनाव के तेवर मोदी को देखकर परवान चढ़े हैं।मोदी के प्रति देश की जनता का भरोसा ही था जिसने भाजपा को पूरे देश में सफलता से सराबोर कर दिया।नरेंन्द्र मोदी ने पहले संघ का भरोसा जीता,उसके बाद पार्टी को जीता,फिर राष्ट्र का भरोसा जीता और उसके बाद भारत को एक ताकत में परिवर्तित करने में अपना सबकूछ झोक दिया। मोदी ने अपनी किस्मत खुद लिखी और भारत से बदकिस्मती को हटाया हैं।मोदी ने अपने जीवन में सारी विपरीत परिस्थितियों को पार करते हुए खुद को भारतीय सियासत का सिंकदर साबित कर दिया हैं। नरेंन्द्र मोदी की राजनीति को एक खांचे में फिट करना संभव नहीं है।मोदी खुद एक पहेली हैं,जिसे उनके करीबी लोग भी नहीं समझ पातें,विपक्ष की बात करना ही बेकार हैं। अच्छा घुड़सवार जानता हैं कि लंबी रेस में बने रहने के लिए घोड़े को दुरूस्त,तंदुरूस्त और अनुशासित रखना चाहिए।कमजोर या इशारों को न समझने वाले घोड़े को अच्छा घुड़सवार बदलने में तनिक भी देर नहीं करता। मोदी औरों के लिए असंभव और खुद के लिए संभव लगने वाली उड़ान तय करने वाले नेता है।मोदी अपने लिए लंबे और उंचे मापदंड़ तय करते हैं।कम समय में ऊंची छलांग लगाना और लंबी दूरी तय करना मोदी की फितरत हैं।ऐसे घुड़सवार के साथ सफर करना हर घोड़े के बस की बात नहीं है।नरेंन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के और शासन के शानदार घुड़सवार हैं। प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
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राजस्थान निकाय चुनाव को लेकर राजस्थान के पत्रकारों,नेताओं,समाज सेवी संगठनों और राजस्थान को भली भाँति समझने वाले प्रबुद्ध लोगों से संवाद करने पर इस बात के संकेत उभर रहे हैं कि बीजेपी के बुरे प्रदर्शन में सवर्ण समाज की नाराजगी को भी देखा जाना चाहिए। प्रश्न यह भी है कि बीजेपी ने जिस वर्ग विशेष के लिए सवर्ण समाज को छोड़ने या छेड़ने का निर्णय लिया है, उस समाज ने भी बीजेपी को कंधे से उतार दिया है। राजस्थान में दलित आरक्षित वार्डों में कांग्रेस ने कुल 803 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि बीजेपी को 536 सीटें मिलीं।यहाँ कांग्रेस को बीजेपी के मुकाबले करीब 267 सीटें अधिक मिलीं। एसटी आरक्षित सीटों पर भी कांग्रेस आगे रही और 53 सीटें जीतीं,जबकि बीजेपी के खाते में 39 सीटें आईं (जो कि कांग्रेस से 14 सीटें कम हैं)। कुल मिलाकर बीजेपी ने राज्य के 41% वार्डों पर कब्जा किया।41 % को बीजेपी प्रचंड जीत मान रही हैं,तो बीजेपी के मुंह में घी शक्कर। प्रश्न यह है कि क्या बीजेपी ने सवर्ण समाज की नाराजगी को बहुत हल्के से लेने या सवर्ण समाज को नज़रअंदाज़ करने का तय कर लिया है? क्या बीजेपी ने अपना पक्ष चुन लिया है? क्या यह मान लिया जाए कि बीजेपी लिए एससी/एसटी और ओबीसी इस देश के नागरिक हैं, सवर्ण नहीं? देश के संसाधनों और शिक्षण संस्थानों पर एससी/एसटी और ओबीसी का पहला हक है,सवर्णों का कोई हक नहीं? क्या बीजेपी की नजर में सवर्ण समाज शरणार्थी है?दोयम दर्जे का नागरिक है? घुसपैठिया है? क्या सवर्ण समाज बीजेपी के लिए सिर्फ वोट बैंक है? बीजेपी ने अपना फैसला सुना दिया है।लाउड एंड क्लियर। अब सवर्ण समाज को भी अपना फैसला करना है,लाउड एंड क्लियर।
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ऐसे चुनाव परिणाम कम देखने को मिलते हैं,जिसमे जीतने वाली पार्टी जीतकर भी डरी हो,और हारने वाली पार्टी हारकर भी गदगद हो।राजस्थान निकाय चुनाव में यही हुआ है।बीजेपी के कान के पास से गोली गुज़र गई, मतलब बीजेपी बाल बाल बची है। बीजेपी के जीत में भी बीजेपी की हार छुपी है। राजस्थान के 10 नगर निगमों में से बीजेपी के 4 नगर निगमों जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में पूर्ण बहुमत मिलने से बड़ी खबर 5 निगमों अजमेर, जोधपुर, भरतपुर, अलवर और पाली में बीजेपी का बहुमत से दूर रहना है।यहाँ निर्दलीय किंग मेकर बनकर उभरे हैं, मतलब निर्दलीय मेयर बनाएंगे।कांग्रेस सिर्फ बीकानेर में जीती है। चुनाव का सबसे दिलचस्प आंकड़ा कुल वोटों का है।भाजपा को 3735 567(36.11%), कांग्रेस को 3635952 (35.14%), और नोटा को 109523 (1.05%) वोट मिले। मतलब बीजेपी को कांग्रेस से सिर्फ़ 99615 (0.97) ज़्यादा वोट मिले हैं। निर्दलीय 27 फ़ीसद से ज़्यादा वोट ले गए। जयपुर जिला तो बीजेपी का गढ़ रहा है।पूरे जयपुर जिले में कांग्रेस को 6 लाख 76 हजार 815 वोट मिले, जबकि भाजपा के खाते में 6 लाख 75 हजार 929 वोट पड़े। यानी कांग्रेस को 886 वोट ज्यादा मिले।वहीं जयपुर में भाजपा को 5 लाख 52 हजार 713 और कांग्रेस को 5 लाख 65 हजार 848 वोट मिले।यानी कांग्रेस को भाजपा से 13,135 वोट ज्यादा मिले। इसके बावजूद 78 वार्ड जीत कर भाजपा जयपुर में बोर्ड बना रही है।इसका कारण वार्ड परिसीमन को माना जा रहा है, जो भाजपा ने दोनों नगर निगमों को एक कर 250 वार्डों को 150 में बदला है। जयपुर नगर निगम में भाजपा ने लगातार सातवीं बार नगर निगम में अपना बोर्ड बना लिया।1994 में पहली बार चुनाव हुए थे।यानी पिछले 32 साल से भाजपा का ही बोर्ड है।बीच में 2009 में मेयर के सीधे चुनाव हुए थे।तब कांग्रेस से ज्योति खंडेलवाल मेयर बनी थी। लेकिन बोर्ड भाजपा का बना था। बीजेपी के लिए यह राजस्थान निकाय चुनाव खतरे की घंटी है। ट्रिपल इंजन की सरकार होने और कांग्रेस में भयानक गुटबाजी होने के बाद भी बीजेपी का यह प्रदर्शन बता रहा है कि बीजेपी के लिए आने वाला समय काफी चुनौतीपूर्ण होगा। बीजेपी अपना मुंह मीठा भले कर रही हो,सच यही है कि जनता ने बीजेपी के दांत खट्टे कर दिए हैं।
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संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को राजभाषा के रूप में हिन्दी को स्वीकार किया था इसलिए हर साल 14 सितंबर हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।इस तरह आज इस साल का सरकारी हिन्दी दिवस है।डेढ़ अरब के देश में शायद सवा प्रतिशत से ज्यादा लोगों को भी ये बात न मालूम हो, मालूम होगा भी तो कोई लेना देना नहीं होगा। हिन्दी दिवस हमारे सरकारी कार्यालयों में यह एक वार्षिक कर्मकांड से ज्यादा कुछ नहीं होता। हिंदी को लेकर हिन्दी भाषी लोग ही पूरी तरह उदासीन हैं।लेकिन हिन्दी का प्रश्न भारत की राष्ट्रीयता से जुड़ा प्रश्न है। हर राष्ट्र की एक भाषा होती है और वह राष्ट्र अपनी भाषा पर गर्व करता है। उसे अपने देश के हर घर में और दुनिया के कोने कोने में पहुंचाने की कोशिश करता हैं। लेकिन भारतवर्ष के दूसरे प्रांतों की बात तो छोड़िए हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों को ही हिन्दी पर गर्व नहीं है। स्वार्थ की राजनीति भी हिन्दी की राह में बड़ा रोड़ा हैं। कुर्सी की कामना और सुविधा की साधना ने हिन्दी को आहत किया हैं। आज हिन्दी अगर सरकारी काम काज में वह जगह नहीं पा सकी है जो उसे मिल जाना चाहिए था तो इसमें देश की अफसरशाही का बड़ा योगदान रहा है। आजादी के बाद भी नौकरशाहों की भाषा अंग्रेजी ही बनी रही। नौकरशाहों को पता था कि यदि पूरा राजकाज हिन्दी में चलने लगा तो देश में नौकरशाही की जगह लोकशाही स्थापित हो जाएगी।इसलिए देश की नौकरशाही ने रास्ता निकाला कि साल में एक दिन हिन्दी दिवस मनाएं और पूरे साल शासन प्रशासन में अंग्रेजी चलाएं। यही कारण है कि आज आजादी के 75 साल बाद भी अंग्रेजी मालिक बनकर कुर्सी पर बैठी हैं और हिन्दी नौकर के समान उसके सामने घुटनों के बल बैठी है। हिन्दी को दूसरे दर्जे की भाषा बना दिया गया। हिन्दी को दूसरे दर्जे की भाषा हिन्दी प्रदेशों में मानने का परिणाम यह हुआ कि शिक्षा, संस्कृति, शक्ति, प्रतिष्ठा, सृजन, सत्ता के हर स्थल से हिन्दी लगभग बेदखल हो चुकी है। उसका परिणाम यह हुआ है कि हिन्दी अब देश के समूचे सत्ता तंत्र में, देशवासियों के भाग्य निर्धारण में, प्रतिभा के विकास और राष्ट्र के नवोन्मेष में कहीं नहीं है। लेकिन आम जन की संपर्क भाषा होने के कारण चुनाव प्रचार में, वोट मांगने में, लोकप्रियतावादी राजनीति और सत्ता प्राप्ति में हिन्दी की उपयोगिता बढ़ी है। राजनैतिक दलों और नेताओं के लिए हिन्दी चुनाव की भाषा तो बन गई, लेकिन चुनाव के बाद सरकार की भाषा नहीं बन सकी। हिन्दी सांप्रदायिक राजनीति का मोहरा बनेगी, बाजार का माध्यम बनेगी या एक बनते हुए राष्ट्र की मेधा, शक्ति, प्रतिभा का महाप्रभाव बनेगी, यह इस देश की जनता पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि हिन्दी के सशक्त हुए बिना हिंदुस्तान का सशक्त होना संभव नहीं है। हिंदी दिवस की बधाई।
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आज गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का विशेष महत्व है क्योंकि इसकी शुरूआत महाराष्ट्र से ही हुई थी। महाराष्ट्र में 500 साल पहले लोग अपने घरों में गणेश की छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाते थे और उसकी पूजा करते थे। ऐसी मान्यता है कि पुणे में स्थित कस्बा पेठ गणपति मंदिर सबसे पुराना है जिसकी स्थापना शिवाजी की माता जीजामाता ने की थी और इसी मंदिर में जीजामाता और शिवाजी ने आदिल शाह से महाराष्ट्र वापस लेने का प्रण किया था। शिवाजी के बाद पेशवाओं ने भी गणेश पूजा की परंपरा को जारी रखा।जब पेशवा बाजीराव ने शनिवार वाड़ा का निर्माण करवाया तो उन्होंने किले में गणेश भगवान की स्थापना की।पेशवाओं का शासन समाप्त होने और औपनिवेशिक युग शुरू होने के बाद सार्वजनिक गणेश उत्सव बंद हो गया लेकिन घर के अंदर होता रहा। वह लोकमान्य तिलक थे जिन्होंने घरों के बंद दरवाजों तक सीमित गणेश पूजा को सार्वजनिक उत्सव में परिवर्तित करने में सफलता प्राप्त की और इसे महाराष्ट्र के घर घर का उत्सव बना दिया। बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र के पुणे में 1893 में पहले सार्वजनिक गणेश उत्सव का आयोजन किया था। गणेश उत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का माध्यम बनाया।गणेश उत्सव को उन्होंने एक आंदोलन का स्वरूप दे दिया। तिलक के शुरू किए गए गणेशोत्सव की एक विशेषता यह भी रही कि इस उत्सव में हिन्दुओं के साथ सभी धर्मो, क्षेत्रों और जाति संप्रदायों के लोग शामिल हुए और इस कारण महाराष्ट्र में गणेशोत्सव एक सर्वव्यापी त्योहार बन गया।तिलक द्वारा शुरू किए गए गणेशोत्सव ने लोगों को एकजुट करने और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।आज महाराष्ट्र में गणेशोत्सव सबसे बड़ा त्योहार है।महाराष्ट्र गणपति को मंगलकारी देवता के रूप में व मंगलपूर्ति के नाम से पूजता है। तिलक के कारण गणपति घर घर के देवता बन गए और सिर्फ हिन्दुओं के ही नहीं, हर धर्म के लोग गणपति में अपना मंगल देखने लगे।हर वर्ग में सब काम बिना किसी विध्न के सम्पन्न हों और चारों तरफ मांगल्य रहे इसलिए गणपति को सबसे पहले पूजा जाता है।बच्चों को भी सबसे पहले ॐ श्री गणेशायनम: से लिखना पढ़ना सिखाया जाता है और विवाह की पत्रिका सबसे पहले गणपति को ही दी जाती है। गणपति का ऐसा स्थान और महत्व हमारे धार्मिक ही नहीं सांस्कृतिक जीवन में भी है।घर घर मनते एक धार्मिक उत्सव को सार्वजनिक जीवन का मंगल उत्सव बनाने का श्रेय लोकमान्य तिलक को जाता है। हालांकि गणेश जी का महत्व और महात्म्य पूरे देश में है लेकिन महाराष्ट्र के लिए गणेश उत्सव क्या है यह दिल्ली या शेष भारत के लोग तब तक नहीं समझ पायेंगे जब तक खुद महाराष्ट्र जाकर नहीं देखेंगे।दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में गणेशोत्सव की वो जातीय स्मृतियां नहीं हैं जो इस उत्सव को लगभग हर घर और हर वर्ग का उत्सव बना दें। ऐसा सिर्फ महाराष्ट्र में ही होता है। गणपति की जितनी जरूरत हमारे धार्मिक और सामाजिक जीवन को है उतनी ही देश की राजनीति को भी है।जैसे महाराष्ट्र में गणपति ने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी वैसे ही आज हमारे नेताओं को कोई सद्बुद्धि दे सकता है तो वह बुद्धि और मंगल के देवता गणपति ही दे सकते हैं।हमारे गणराज्य को बचाने के लिए अग्रदूत के रूप में गणपति ही चाहिए क्योंकि गणपति नहीं होते तो यह गणराज्य भी नहीं होता। गणपति बप्पा मोरया
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सोशल मीडिया पर लिखने वाला एक वर्ग तथ्यों से बुरी तरह अपरिचित होता है और भावनाओं में बुरी तरह बह कर लिखता है। इस वर्ग के साथ समस्या यह भी है कि यह वर्ग क्रांति करने को बुरी तरह उत्साहित रहता है लेकिन क्रांति की वास्तविकता से बुरी तरह अपरिचित होता है। इस वर्ग को ऐसे भी पहचाना जा सकता है कि यह वर्ग किसी घटना पर बुरी तरह उछल कर प्रतिक्रिया देते हैं और सच उनसे दूर खड़ा उन पर बुरी तरह हंस रहा होता है।
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हर रोज़ समय का ज़्यादा हिस्सा सोशल मीडिया स्क्रॉल में गुज़र जाता है। तत्काल और सेकेंडों में खबरों की खबर लेने के लिए सोशल मीडिया सबसे आसान और स्मार्ट लगता है, लेकिन आज के रील,एल्गोरिद्म सोशल मीडिया वह रास्ता है,जहां से लोग अपनी स्वतंत्र सोच खो रहे हैं और समाज खतरनाक ‘भेड़चाल’ के गर्त में फंस रहा हैं। सोशल मीडिया की हर बात को सच मान रहे हैं।जबकि सच कम और झूठ ज़्यादा है। सोशल मीडिया पर सरपट दौड़ रहे हैं। सोचने, समझने और ख़ुद से पूछने का समय नहीं है।खुद सोचने की क्षमता खोते जा रहे हैं।खुद सोचने की क्षमता खोने का संबंध इंसान के कम पढ़े-लिखे या कम बुद्धिमान होने से नहीं है। यह एक मानसिक और सामाजिक बीमारी है, जहां इंसान अपने विवेक का इस्तेमाल करना बंद कर देता है और भेड़चाल को अपना लेता है, जो खतरनाक है। दरअसल आज लोग सोचने की जिम्मेदारी सोशल मीडिया को सौप रहे हैं।जब लोग खुद तर्क करने के बजाय किसी सत्ता,संस्था या सोशल मीडिया और टीवी डिबेट के कहे को अंतिम सच मान लेते हैं, तो वे अपना दिमाग ‘ऑफ’ कर देते हैं।कई बार ऐसा भी होता है कि समूह से अलग-थलग पड़ने या ट्रोल होने के डर से इंसान अपनी सही राय को दबा देता है और भीड़ के सुर में सुर मिलाने लगता है। डिजिटल युग ने हमारी सोच को मुक्त करने के बजाय उसे प्रभावित करने की नई मशीन बना ली है।क्यों, पूछने की आदत डालें" कोई भी खबर या विचार स्वीकार करने से पहले उस पर विचार करे, कुछ देर उस खबर पर रुके।सिर्फ वही खबरें न देखें, जो आपकी राय से मेल खाती हैं।विपरीत विचारधारा और तर्कों को भी पढ़ें और समझें। भीड़ का हिस्सा बनने से बेहतर है कि अगर कोई बात गलत लगे,तो विनम्रतापूर्वक उससे असहमत होने की हिम्मत जुटाएं।सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस रखें।भीड़ बनकर किसी का अनुसरण ना करे।
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