मित्रों के अनुरोध पर एक प्रयोग किया, त्वरित सेवा के लिए कुरियर कंपनी DTDC से बात की और कांच की बॉटल में गौपालकों का घी भिजवाया। प्रति किलो पर 525 ₹ खर्च अधिक आ गया। राम दुहाई!
अब बताएं, इस कथित स्टेंडर्ड पर कब तक सामान्य उपभोक्ता टिकेंगे? और कब तक वास्तविक उत्पादक समाज, यानी
#गौपालकों का हित सधेगा?
दिल्ली के एक उद्यमी ने हमारे चंबल के गौपालकों से घृत लिया और विक्रय मूल्य चार गुना रखा। बोला, "दादा! मार्केटिंग, पैकेजिंग और कमीशन का खर्च है, खरीद से चार गुना ज्यादा रखना ही पड़ेगा।"
सुंदर, आकर्षक पैकिंग में घृत भिजवाया जाए? या फिर पुरानी व्यवस्था चलने दें? ना गौपालकों को लाभ बचा ना वास्तविक ग्राहकों को? बीच रास्ते में सारा
#शुभ_लाभ धरवा लिया बाजार के खिलाड़ियों ने। क्योंकि शहरी उपभोक्ता
#मूल नहीं,
#ब्रांड के सामने नतमस्तक है। समाज को समाज पर विश्वास ही नहीं। सत्ता हो या अर्थ, या फिर सामाजिक रिश्ते, सारा संकट ही विश्वास का है।
वैसे भी ज्यादा समय बचा नहीं, भारत में भी अमेजन, बिलिंकिट, फिलिफ़कार्ट जैसी
#ई_कामर्स कंपनियां उत्पादक और ग्राहक, दोनों को निगल जाएगी।
भारत में आज 27 करोड़ ग्राहक ई-प्लेटफार्म से खरीदारी कर रहे हैं। हर साल इनमें 18 से 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। यह आंकड़ा भयावह है। डरा रहा है।
सवाल यह है, सोशल मीडिया पर दिन-रात बौद्धिक जुगाली करने वाला बौद्धिक तेजी के साथ बदलते बाजार के आयाम को देख पा रहा है? समझ रहा है? यदि है तो
#आर्थिक_पराधीनता पर लोकविमर्श कहां खड़ा है? और कैसे बनता है कोई समाज या देश
#गुलाम? किस अंधेरे कोने में झक मार रहा है लोकविमर्श?
संभव है ज्ञानीजन कहें, समय के साथ परिवर्तन जरूरी है। तो मेरा नादान प्रश्न है, इस परिवर्तन के परिणाम क्या होंगे?