24 साल हिंदी-अंग्रेजी के राष्ट्रीय कारोबारी मीडिया में रहा। विद्वान नहीं, जिज्ञासु हूँ। चंबल में गाय चराता हूं।

चंबल का जंगल
फ्रांस को सड़कों पर जारी बवाल का जिम्मेदार #अल्ट्रा_लेफ्ट को बताया जा रहा है। पूरे जिस्म को ढके, मुंह पर नकाब..? यह वामपन्थ का वर्तमान स्वरूप है? किसान, मजदूर, छात्रों के आंदोलन से संसदीय लोकतंत्र से निकल #रेजिम_चेंज की यात्रा।
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फर्जी खबर पर एक किस्सा सुना, जब "टाइम्स ऑफ इंडिया" के पटना संस्करण में इंटर्नशिप करने गया। सन 1990 की बात है। कुछ वरिष्ठ मित्रों ने बताया, दीनानाथ मिश्र जी स्थानीय संपादक थे, भागलपुर के अंशकालिक रिपोर्टर को चुल्ल मची रहती थी। एक दिन भागलपुर रिपोर्टर ने खबर भेजी, "...पागल होकर सर्कस का हाथी शहर में घुसा, चौतरफ़ा हंगामा।" खबर महत्वपूर्ण थी सो पहले पेज पर लगा दी गई। अगले दिन देर शाम सर्कस का मालिक भागा हुआ पटना आया। मिश्र जी को बताया, "..दरअसल आपका पत्रकार हर दिन अपने यार-दोस्त, रिश्तेदारों के लिए दस-बीस फ्री पास मांगता, आखिर कहां तक रोज-रोज देते?" अगले दिन पटना के नवभारत टाइम्स के प्रथम पेज पर खबर छपी, "हाथी नहीं पत्रकार पागल हुआ है।" लेकिन @nehafolksinger और @ABPNews के बीच आपसी नूरा कुश्ती में दोनों नहीं, बकिया समाज पागल हो चुका है। बल्कि यूं कहें, दोनों मिलकर बाकी समाज को पलटू बना रहे हैं। और समाज बन रहा है। खुशी-खुशी! इनमें एक ओर बाजार से खारिज वो बौद्धिक हैं जो चुकती उम्र में नेहा पर नेह की बारिश कर खुद के जिंदा होने का अहसास जीवित रखने की जद्दोजहद में लगा हुआ हैं। दूसरे वो तमाम है, जिनके लिए नेहा बदबू मारती एक नाबदान है। हैरान मत होइए, ये वही बौद्धिक हैं, जो खाली वक्त में मात्र बौद्धिक जुगाली के लिए खेत-खलिहान, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवा, गरीबी, नफरत की राजनीति पर बात करते हैं और अलंकारिक भाषा में पोस्ट लिखते हैं। मौका खोजते हैं, टीवी स्क्रीन और मंचों पर कबड्डी खेलने का अवसर मिल जाए। क्या हम या आप वाकई भावी पीढ़ी और व्यापक समाज के लिए चिंतित हैं? क्यों नहीं हम सभी खुद को पागल घोषित कर दें? स्वेच्छा से।
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मित्रों के अनुरोध पर एक प्रयोग किया, त्वरित सेवा के लिए कुरियर कंपनी DTDC से बात की और कांच की बॉटल में गौपालकों का घी भिजवाया। प्रति किलो पर 525 ₹ खर्च अधिक आ गया। राम दुहाई! अब बताएं, इस कथित स्टेंडर्ड पर कब तक सामान्य उपभोक्ता टिकेंगे? और कब तक वास्तविक उत्पादक समाज, यानी #गौपालकों का हित सधेगा? दिल्ली के एक उद्यमी ने हमारे चंबल के गौपालकों से घृत लिया और विक्रय मूल्य चार गुना रखा। बोला, "दादा! मार्केटिंग, पैकेजिंग और कमीशन का खर्च है, खरीद से चार गुना ज्यादा रखना ही पड़ेगा।" सुंदर, आकर्षक पैकिंग में घृत भिजवाया जाए? या फिर पुरानी व्यवस्था चलने दें? ना गौपालकों को लाभ बचा ना वास्तविक ग्राहकों को? बीच रास्ते में सारा #शुभ_लाभ धरवा लिया बाजार के खिलाड़ियों ने। क्योंकि शहरी उपभोक्ता #मूल नहीं, #ब्रांड के सामने नतमस्तक है। समाज को समाज पर विश्वास ही नहीं। सत्ता हो या अर्थ, या फिर सामाजिक रिश्ते, सारा संकट ही विश्वास का है। वैसे भी ज्यादा समय बचा नहीं, भारत में भी अमेजन, बिलिंकिट, फिलिफ़कार्ट जैसी #ई_कामर्स कंपनियां उत्पादक और ग्राहक, दोनों को निगल जाएगी। भारत में आज 27 करोड़ ग्राहक ई-प्लेटफार्म से खरीदारी कर रहे हैं। हर साल इनमें 18 से 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो रही है। यह आंकड़ा भयावह है। डरा रहा है। सवाल यह है, सोशल मीडिया पर दिन-रात बौद्धिक जुगाली करने वाला बौद्धिक तेजी के साथ बदलते बाजार के आयाम को देख पा रहा है? समझ रहा है? यदि है तो #आर्थिक_पराधीनता पर लोकविमर्श कहां खड़ा है? और कैसे बनता है कोई समाज या देश #गुलाम? किस अंधेरे कोने में झक मार रहा है लोकविमर्श? संभव है ज्ञानीजन कहें, समय के साथ परिवर्तन जरूरी है। तो मेरा नादान प्रश्न है, इस परिवर्तन के परिणाम क्या होंगे?
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भारत में जब ढेर सारे बौद्धिक #रेजिम_चेंज के शाब्दिक अर्थों को लेकर डिक्शनरियाँ पलट रहे है, किताबों से माथा फोड़ तरह-तरह की भाषाओं से समझा रहे थें, #फ्रांस ने "रेजिम चेंज" के मायने साक्षात कर दिए। खुली सड़कों पर "रेजिम चेंज" का "खुला मतलब" उतार दिया। उम्मीद है, #प्रशांत_भूषण फ्रांस से आयातित इन मायनों से असहमत नहीं होंगे। ना निंदा करेंगे। माहौल ठीक नहीं, इसलिए समर्थन भी ना करें।
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कोलकाता में भगदड़? बात कुछ हजम नहीं हुई। कोलकाता के #जनसत्ता में कुछेक साल रहा, मेट्रों ट्रेन का टिकट हो या सिनेमा का टिकट! या फिर राजनीतिक जुलूस! हर कहीं #कतार का अनुशासन। ऐसे में पूजा पंडाल में भगदड़? जहां हर कदम पर पूजा कमेटी कब स्वयं सेवी तैनात रहते हैं। #STAMPEDE
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नेहा सिंह राठौर पर @ABPNews ने #वेश्यावृति की खबर चलाई। हालांकि बाद में माफी भी मांग ली। लेकिन इस बीच @nehafolksinger ने "आनन्द बाजार पत्रिका चैनल" पर भाजपा-संघ समर्थन में दुष्प्रचार का आरोप लगा दिया। नेहा जी! दैहिक ना सही यह #बौद्धिक_वेश्यावृति तो अवश्य हुई। भारत जानता है, ABP चैनल का मालिक अबिक सरकार वामपंथी व तृणमूल समर्थक है। इस समूह का अंग्रेजी दैनिक @ttindia दिन-रात @narendramodi और हिंदुत्व के खिलाफ जहर उगलता रहता है। ऐसे में नेहा को पलटवार और स्वयं को निर्दोष या पीड़ित दिखाने के एवज में तथ्यात्मक होना चाहिए था। हालांकि मेरी नजर में नेहा #दोयम_दर्जे की महिला है। सोशल मीडिया पर गन्ध मचाने वालों में से एक। बावजूद कहना चाहूंगा, अपने घर की लड़ाई और गन्दगी में भारत के निर्वाचित प्रधानमंत्री को ना घसीटे। अपनी हैसियत में रहे। आप और ABP चैनल आपस में निपटे। बहुत मुमकिन है, स्वयं के गिरते ग्राफ से घबरा कर आपस में दोनों ने मिलकर ड्रामा किया?
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सेक्युलर पत्रकार और बौद्धिकों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है, खुल कर अपनी #भक्ति को, अपनी भक्ति के #मायनों को, कथित भक्ति के #लक्ष्य को सार्वजनिक बहस में ला नहीं पा रहे हैं। इसलिए सारा जोर रेजिम चेंज, हिंन्दुत्व, RSS और BJP पर आकर अटक चुका है। गुजरे वक्त के मेरे #कामरेड_मित्रों कुछ अपने ख्वाब! अपने मकसद! अपने अतीत! पर भी तो बात करो! हरेक को खारिज करते-करते आज हर कहीं से खुद खारिज हो चुके हो। कठमुल्ले बन गए। ऐसे लड़ोगे संसदीय लोकतंत्र में?
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यहां मुद्दा भाजपा-कांग्रेस का नहीं है। मुद्दा है, जब एक आम नागरिक के सामने #नागरिक_सम्मान हासिल करने का रास्ता ना हो, प्रेरणा ना हो तो पूरी व्यवस्था #जुगाड़ पर चलने लगती है। सत्ता के इर्द-गिर्द चापलूस बन कर रह जाती है। इस बात पर कोई संशय नहीं है, सन 2014 के बाद @narendramodi के नेतृत्व में सरकार ने ना जाने कितने ही मामूली-अनजान नागरिकों को #पद्यम_सम्मान से विभूषित किया। आमजन को प्रोत्साहित किया। सबसे बड़ी बात,पद्यम सम्मान का #नामांकन सरकार, गांधी परिवार की मेहरबानी और अफसरशाही से छीन कर आमजन को सौंप दिया। इसे सत्ता की ताकत का #विकेंद्रीकरण नहीं तो और क्या कहें? अतीत का पुनर्पाठ बहुत जरूरी है। ताकि #भविष्य को संशोधित किया जा सके। अब यह आप पर है #व्यवस्था_संशोधन को कैसे देखते हैं?
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हर #सत्ता का एक ही काम, जल, जंगल और जमीन बेच डालो। जब एक आम आदमी, बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और सस्ते इलाज के लिव सँघर्ष कर रहा है, खामोश खड़े धनपति सत्ता से सौदा कर रहे हैं। धरी रह गई वह आवाज, इकोलॉजी, पयावरण, पहाड़ की संस्कृति, बाहरी लोग...हेन-तेन। लोकतंत्र में इसे #रियल_इस्टेट_पॉलिटिक्स कहते हैं। इससे दो पैरों पर नाचता हुआ #विकास आता है।
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एक वक्त था, आंदोलनकारी बसों से या ट्रेन की स्लीपर बोगी में यात्रा करते। गांव-जवार में भोजन करते। खुले में सोते। बदन पर खादी का कुर्ता और पैरों में मामूली चप्पल रहती। चौबीस घण्टे जनसंवाद के लिए प्रस्तुत। सड़क पर ही प्रेस कांफ्रेंस। आज आंदोलनकारी समृद्ध हैं। हवाई जहाज से सफर करते हैं। फाइव स्टार होटल्स में जश्न मनाते हैं। लाखों किराया दे पॉश इलाकों में रहते हैं। धरने पर जिमेटो, स्वेगी से हर पल बिरयानी के हजारों पैकेट सप्लाई हो रहे हैं। मोटा किराया देकर प्रेस क्लब में "प्रेस कांफ्रेंस" हो रही है। तो आंदोलनकारियों को जंतर-मंतर से बाहर कर #रामलीला_मैदान भेजा जाना नैतिक है। हर सेवा का #शुल्क दीजिए, फिर "प्रायोजित प्रदर्शन" कीजिए। "अभिव्यक्ति की आजादी" अब #मुफ्त नहीं रही। ना मुफ्त रहनी चाहिए। हर सेवा का एक शुल्क है। क्योंकि सरकार की ओर से दी जा रही हर सेवा का भार #टैक्सपेयर उठा रहे हैं।
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ये एक पत्रकार हैं। हमारी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ही जूनियर हैं। सम्भवतः @News24 से जुड़े हुए हैं। युवाओं से सवाल कर रहे हैं, आज युवा बड़े बाल क्यों रखते हैं? हमारे वक्त तो छोटे बाल रखते थे? गंभीर और जन सरोकारी पत्रकारिता का अदभुत प्रश्न। अरे भई राजीव! क्या बात करते हो? हमारे वक्त अमिताभ बच्चन उरूज पर थे। लौंडे कनपटी को बालों से ढक कर रखते थे। नाऊ की दुकान पर अमिताभ, विनोद खन्ना, विनोद मेहरा, सुनील दत्त जैसे तमाम फिल्मी सितारों की फोटो लगी रहती थी। लौंडे इनमें से किसी एक की स्टाइल को चुन बाल कटवाते। बेलबॉटम या सफारी सूट पहनते। हां! यह दीगर है, इलाहाबाद विश्विद्यालय में दाखिले के बाद पढ़ाई-लिखाई की गंभीरता समझ आई। बाल छोटे हुए। देह पर खादी का कुर्ता और पैरों में 99₹ वाली जुबली चप्पल आई। लेकिन यह सब किसी आदर्श का नहीं, परिवेश के असर था। परिवेश शुद्ध हुआ तो आदर्श भी निखरे। यकीन नहीं है तो उन तमाम संपादक/पत्रकारों की जवानी वाली फोटों देख लो, जो आज अधेड़ हो चुके हैं। आज आदर्श बघार रहे हैं। अधेड़ होती हर पीढ़ी के लिए बहुत आसान है, सामने खड़ी युवा पीढ़ी को #आदर्श_की_डोज पिलाना। यह अधेड़ पीढ़ी इतनी #मक्कार क्यों? सबसे बड़ी समस्या ही यह है, हर गुजरती पीढ़ी, अपने अतीत को लेकर युवा पीढ़ी से झूठ बोलती है।
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चहुंओर #लोकतंत्र_बचाओ का शोर? कमबख्त! उमर बीत रही है, आज तक समझ ना आया कि यह लोकतंत्र कौन सी बला है? हम जैसे मूर्ख को कोई सरल शब्दों में बता सकता है, लोकतंत्र कहते किसे हैं? हम मामूली लोगों के अस्तित्व से लोकतंत्र का क्या रिश्ता है? अब अब्राहम लिंकन का जुमला मत दोहराने लगना।
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जब जन्म से एक हिंदू, ओबीसी कन्वर्ट होकर मुस्लिम बनकर आरक्षण नहीं ले सकता तो एक जन्म से एक मुस्लिम ओबीसी आरक्षण का लाभ कैसे ले सकता है ? शीर्ष न्यायपालिका आरक्षण को हिन्दू समाज में समेटने का अवसर लगातार दे रहा है। जरूरत है, व्यापक गोलबन्दी की। सत्ता संघर्ष के "सामाजिक आधार" को व्यापक करने की। जरूरत है, बहस और फलक को व्यापक करने की। क्या UGC और SC/ST कानून में अटके हुए हो? भविष्य उनका होता है, जो हर मौके को हथियाना और दुश्मन को दुश्मन के हथियार से मारना जानते हैं। 🙏🏻
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पता नहीं कौन है यह युवा? पर भाषा बता रही है, वैचारिकी में "प्लेट में दो समोसा" वाला है। सवाल है, यदि प्रेस कांफ्रेंस में @republic चैनल के पत्रकार ने पूछा, आप व्यवस्था को अस्थिर करना चाहती हैं? तो @neha_aisa को उत्तर भी #व्यवस्था पर देना चाहिए! अपने आंदोलन के मकसद पर, तौर-तरीकों पर और सबसे बढ़कर मुद्दे के "संवैधानिक व न्यायिक पक्ष" पर जवाब देना चाहिए था। कम से कम छात्र जीवन में वामपंथी रहते हमने तो यही काम किया। वैचारिकी का उत्तर वैचारिकी से दिया। यह वामपन्थ नहीं, यह वैचारिकी से दिवालिया हो चुका #अमेरिकी_वोकेज्म है। @abhijeet_dipke से तो वैचारिकी की उम्मीद करना भी गटर में रेन डांस करना है।
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मुद्दा #रेजिम_चेंज का नहीं है। असल मुद्दा है, #सिस्टम_चेंज का। सत्ता पर काबिज असरदार लोगों को रेजिम से तभी समस्या होती है, जब सिस्टम खुद के मुफीद ना रहे। घर बैठे फोन से सिस्टम मैनेज ना हो रहा हो। बाकी, नफरत, हिन्दू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद केवल हल्लाबोल नारे हैं। बेदम नारे। कम से कम शिकायत या तकलीफ तो सही लफ्ज में दर्ज कराओ @pbhushan1 ? वरना आपकी बीमारी का इलाज कैसे होगा? बढ़े चलो! @narendramodi ! करोड़ों लेकिन मौन दिख रहे #भारत_के_लोग आपके साथ हैं।
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दिल्ली पुलिस के एक जाट अधिकारी ने थोड़ी देर पहले फोन किया। बोले, "दादा! अपने पत्रकार-युट्यूबर मित्रों को सहेज दीजिए, कल सलीके से रहें, @AmitShah तपा हुआ है, कुछ भी हो सकता है।" मित्र से कहा, भाई! इस भीड़ में मेरा कोई मित्र नहीं हैं, मित्रजन घर बैठ आनन्द ले रहे हैं, परिचित हैं कई, लेकिन उनकी चिकन बिरयानी और बीयर का सवाल है, कैसे रोकूं? फिर भी मासूम युवाओं से कहना चाहूंगा, कल देश का नहीं, सबसे पहले अपना और अपने माता-पिता का ख्याल रखें। @RahulGandhi भैया से "सुरक्षित नजदीकी" बनाए रखना।
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बंगाल में धूमधाम से #मां_दुर्गा की पूजा हो ही है। कोलकाता के केनिंग स्ट्रीट से लेकर पार्क स्टीट, दूरदराज गांवों तक, जहां बीते 50-60 सालों से पूजा पंडाल नहीं सजे। बंगाल, कश्मीर, पूर्वोत्तर, पंजाब, ऊत्तराखण्ड राजथान, केरल सरीखे राज्य हमारी #चहारदीवारी है। जिस घर की चहारदीवारी टूटी है, आवारा कुत्ते आकर रसोई में पेशाब करके जाते हैं। मध्य भारत के प्रयागराज का होने के कारण अपनी चहारदीवारी को लेकर चिंतित रहता हूं। ख्याल रखता हूं। इन राज्यों के समाज की निष्ठा, आस्था, लोक उत्सव, रीति-रिवाज का सम्मान करता हूं। वामपंथी जीवन में एक बात की बड़ी भयंकर कमी रह गईं। सत्ता संघर्ष के राजनीतिक विमर्श में कभी आस्था यानी #सांस्कृतिक_शक्ति को नहीं पहचान सका। ना कभी विचार किया। हालांकि आज यह कमी बहुसंख्य हिन्दू समाज के बौद्धिक-शिक्षितों में बड़े स्तर पर दिखती है। #भदेस_भारत भले शब्दों से अपने भाव अभिव्यक्त ना कर सके, पर आचरण में जी कर दिखा देगा। बिहार की छठ पूजा, महाराष्ट्र का गणपति उत्सव और बंगाल की दुर्गा पूजा मुझे बहुत प्रभावित करते हैं। जैसा जन सैलाब उमड़ता है, मेरे उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई पर्व नहीं दिखता। कुंभ का जिक्र इस सन्दर्भ में रखना सटीक नहीं। आखिरी बात, भारत के हिन्दू समाज में परिवर्तन की असख्य धाराएं बह रही है। गंगोत्री से गंगासागर तक। जबकि हिंदी प्रदेश की सोशल मीडिया की चर्चा "राजनेताओं और व्यक्ति विमर्श" तक सीमित है। इस बंधन को तोड़िए। निर्बाध बहने दीजिए #मां_गंगा को गंगोत्री से गंगासागर तक। हिंन्दुत्व तभी प्रसन्न, उत्फुल्लित, तभी सशक्त, जब निर्बाध है। सत्ता संघर्ष में स्टेट कैप्चर का रास्ता दुर्गा पूजा, छठ और गणेश उत्सव सरीखे असंख्य लोक पर्वों से भी गुजरता है। जंतर-मंतर का शोर शराबा, उछल-कूद मां गंगा के निर्बाध होने का #भय है। आभार @narendramodi जी। आभार @SuvenduWB जी। ...और @MamataOfficial दी, आपको दुर्गा पूजा की असंख्य शुभेच्छा। विलंब के लिए क्षमा।
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साइंटिफिक आंकड़े, पत्रकारों के अनुमान और राजनीतिक दलों के दावों में इतना भारी अंतर अचंभित करता है। कल 12 अकबर को दिल्ली में #चुनाव_आयोग के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सेदारी की संख्या पर गौर कीजिए। जो AI INTELLIGENCE #GROK ने दिया। ■ @grok का मानना है, प्रति वर्ग मीटर दो से चार व्यक्ति के हिसाब से यह संख्या 7 से 15 हजार है। ■ GROK की छानबीन है, रिपोर्टर्स और मीडिया इस भीड़ को दस हजार से 40 से 50 हजार तक बता रही है। ■ वहीं विपक्षी दल, खासकर @RahulGandhi की @INCIndia का दावा है, ढाई लाख से ज्यादा लोगों का जुटान हुआ। बेसिर-पैर के इन बेलगाम आंकड़ों के दो असर संभावित है। ● भारत के दूर-दराज इलाकों में बैठे नागरिकों को लगेगा, आंदोलन बड़ा सशक्त है और सरकार बैकफुट पर आ चुकी है। ● दूसरे, बुराड़ी जैसे खुले-बड़े मैदान में कोई भी राजनीतिक दल इसलिए आंदोलन या प्रदर्शन करने से हिचकिचा रहा है, #कलई खुल जाएगी। आंकड़ों का यह मायाजाल मेरे जैसे पत्रकार रहे व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि 5-6 साल पहले तक रैली या प्रदर्शन में भीड़ की संख्या रिपोर्टर्स की श्रद्धा पर निर्भर करता था। राजनीतिक और राजनेताओं से संबन्ध के आधार पर कवरेज कर आया रिपोर्टर संख्या देता और हमारे पास छानबीन का कोई औजार भी नहीं था। यह बात जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस या फिर टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे पत्रकारिता के शीर्ष संस्थानों में गुजारे समय के निजी अनुभव से बता रहा हूं। किन्ही छुटभैया संस्थानों की बात नहीं कर रहा। GROK का स्क्रीन शॉट नीचे कमेंट में है।
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@grok क्या ऊपर दिए अपने आंकड़ों पर अभी टिके हुए हो? या मूड बदल गया। बाहर से फंडिंग आ गई? वैसे आपकी इस चीर-फाड़ ने @RahulGandhi और मीडिया की साख को रसातल पर ल दिया।
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यह रहा @grok का अनुमान। फिलहाल अनुमान ही कह रहा हूं।
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