वो तमाम तथाकथित बुद्धिजीवी और पत्रकार संपादक जो सरकार के डर के मारे रजाई ओढ़ कर गर्मियों में भी सोये पड़े थे, अचानक नींद से जाग गये हैं और दिप्के, सौरव और रांका पर फैसले देने लगें है ।
ये कितने भीरू और डरपोक लोग हैं ?
बिना रीढ की हड्डी के ये लोग ही देश की मौजूदा हालत के लिये असली ज़िम्मेदार हैं ?