बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी का यह कहना कि अमेरिका ने गाय के मूत्र के औषधीय गुणों को "पेटेंट" कर दिया है, विज्ञान और पेटेंट व्यवस्था—दोनों की भ्रामक व्याख्या है। पेटेंट मिलना और किसी दवा का वैज्ञानिक रूप से प्रभावी सिद्ध होना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। पेटेंट कार्यालय यह प्रमाणित नहीं करता कि कोई दावा चिकित्सकीय रूप से सही है; वह केवल किसी नए विचार या प्रक्रिया पर बौद्धिक संपदा अधिकार देता है। किसी पदार्थ को दवा के रूप में मान्यता तब मिलती है जब वह FDA जैसी नियामक संस्था के कठोर वैज्ञानिक और क्लिनिकल परीक्षणों में प्रभावी और सुरक्षित साबित हो। गाय के मूत्र को ऐसी स्वीकृति प्राप्त नहीं है। यदि केवल मूत्र में पाए जाने वाले रासायनिक घटक ही कसौटी होते, तो भैंस, याक, ज़ेब्रा, ऊँट या अन्य अनेक स्तनधारियों के मूत्र पर भी ऐसे ही दावे और राजनीतिक अभियान चल रहे होते। ऐसा नहीं है, क्योंकि विज्ञान प्रतीकों से नहीं, प्रमाणों से चलता है। दुर्भाग्य यह है कि हमारे यहाँ वैज्ञानिक प्रक्रिया की जगह आधे-अधूरे तथ्यों को राजनीतिक आख्यान में बदल दिया जाता है। पेटेंट को प्रमाण, दावा को सत्य और प्रचार को विज्ञान बताना जनता को भ्रमित करने के अलावा कुछ नहीं है।
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जनता की जमीन है या सत्ता का इनाम बाँटने का खजाना? इंडियन एक्सप्रेस की अदिति राजा की रिपोर्ट बताती है कि गुजरात सरकार ने यूसुफ पठान को वडोदरा में उनके बंगले से सटी नगरपालिका की 978 वर्गमीटर जमीन देने की मंजूरी दी है। इसमें 500 वर्गमीटर उपहार में और बाकी 478 वर्गमीटर निर्धारित मूल्य पर 45 प्रतिशत छूट के साथ देने का फैसला है। पूरे भूखंड का मूल्यांकन लगभग 20.5 करोड़ रुपये हुआ था। नगरपालिका की अंतिम मंजूरियों की प्रक्रिया अभी बाकी है। इसी जमीन पर कथित अतिक्रमण हटाने के लिए उन्हें 2024 में नोटिस मिला था। अब तस्वीर बदल गई है। जून 2026 में पठान दूसरे सांसदों के साथ तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए और अगस्त में गुजरात सरकार ने जमीन देने की मंजूरी दे दी। (indianexpress.com⁠) यह घटनाक्रम अपने आप में राजनीतिक सौदेबाजी पर सरकार से सवाल पूछने के लिए पर्याप्त है। जिस जमीन को खाली कराने का नोटिस दिया गया था, उसे अब उपहार और भारी रियायत पर देने का औचित्य क्या है? इसमें कौन सा जनहित है ? मौजूदा सत्ता व्यवस्था पर यही तो गंभीर सवाल है। राजनीतिक वफादारी बदलते ही किसी नेता के प्रति सरकारी व्यवहार क्यों बदलने लगता है? विपक्ष में रहते हुए जिसके पीछे जांच एजेंसियाँ पड़ती हैं, सत्ता के करीब आते ही उसके मामले की रफ्तार धीमी क्यों पड़ जाती है? जमीन, ठेके, पट्टे और सरकारी पद आखिर किस कसौटी पर बाँटे जाते हैं? न्यायपालिका के मामले में भी कसौटी उतनी ही कड़ी होनी चाहिए। सत्ता के अनुकूल फैसले देने वाले किसी न्यायाधीश को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद मिलता है तो फैसलों की स्वतंत्रता पर संदेह क्यों न हो? हर नियुक्ति को किसी फैसले की कीमत कहना उचित नहीं होगा, लेकिन उस संदेह को दूर करने की जिम्मेदारी से सरकार और पद स्वीकार करने वाला व्यक्ति कैसे बच सकता है? लोकतंत्र में सांसद की निष्ठा उसके मतदाता के प्रति और न्यायाधीश की निष्ठा संविधान के प्रति होनी चाहिए। अगर संदेश यह जाने लगे कि सत्ता को खुश रखिए और बदले में पद, संरक्षण या संपत्ति पाइए, तो संस्थाओं पर जनता का भरोसा कैसे बचेगा? एक साधारण नागरिक सार्वजनिक जमीन पर कब्जे के आरोप में अपना घर उजड़ते देख सकता है। एक प्रभावशाली व्यक्ति उसी जमीन को उपहार में पाने की मंजूरी हासिल कर लेता है। कानून की बराबरी कहाँ गई? सरकार सार्वजनिक संपत्ति की रखवाली के लिए चुनी जाती है। उसे राजनीतिक मेहरबानी में बाँटने के लिए नहीं। जनता का धन, जनता की जमीन और सरकारी संस्थाएँ किसी दल की निजी जागीर नहीं हैं।
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14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों को सऊदी अरब में मृत्युदंड दिया गया। सऊदी अधिकारियों ने मस्जिद में कथित “अनैतिक कृत्य” का आरोप बताया, लेकिन सार्वजनिक विवरण से यह स्थापित होता दिख रहा है कि मामला सिर्फ चुंबन का था। आज, 19 अक्टूबर को प्रकाशित Jago News की रिपोर्ट में नज़रुल के पिता ने कहा कि दोनों पति-पत्नी नहीं थे और उनके बेटे का शव भी बांग्लादेश नहीं पहुँचा है। नज़रुल के पिता ने कर्ज लेकर अपने बेटे को सऊदी अरब कमाने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि बेटा कमाएगा और घर की हालत कुछ सुधरेगी। अब पिता अपने बेटे का शव वापस माँग रहा है। बांग्लादेश के नज़रुल इस्लाम और सिति अख्तर को सऊदी अरब में 14 अक्टूबर को मृत्युदंड दे दिया गया। सऊदी अधिकारियों का कहना है कि उन्हें मक्का की एक मस्जिद में “अनैतिक कृत्य” के मामले में दोषी ठहराया गया था। इसके साथ सोशल मीडिया पर एक कहानी फैल रही है—दोनों नवविवाहित थे, हनीमून पर गए थे और पति ने पत्नी का माथा चूम लिया था। इस कहानी की पुष्टि नहीं हुई है। नज़रुल के पिता ने तो दोनों के पति-पत्नी होने और शव बांग्लादेश लौट आने के दावों का खंडन किया है। लेकिन इन अपुष्ट बातों को हटा देने के बाद भी जो बचता है, वह बेहद तकलीफदेह है। दो इंसानों की जान ले ली गई। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उसे और उसके मिशन को न्यायिक कार्यवाही की पहले जानकारी नहीं दी गई थी। अब वह सऊदी सरकार से विवरण माँग रहा है। आखिर आरोप क्या था? सबूत क्या थे? दोनों को अपना पक्ष रखने, वकील की मदद लेने और अपनी भाषा में कार्यवाही समझने का कितना अवसर मिला? ऐसा क्या था जिसके लिए उनकी जान लेना जरूरी समझा गया? किसी सरकार का “अनैतिक” कह देना हमारी सारी जिज्ञासा और संवेदना खत्म नहीं कर सकता। मेरी नज़र में सहमति से बने किसी वयस्क संबंध या स्नेह की अभिव्यक्ति के लिए मृत्युदंड स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि मैं तो राज्य द्वारा किसी की भी जान लेने के अधिकार से पूरी तरह असहमत हूँ । इस मामले में वास्तव में क्या हुआ, उसका पूरा सच सामने आना चाहिए। धार्मिक स्थल की मर्यादा का महत्व है लेकिन क्या वह इंसान की जिंदगी से बढ़कर होना चाहिये । न्याय की कसौटी में दया, सुनवाई और सजा का अनुपात भी शामिल होना चाहिए कि नहीं? नज़रुल के पिता के सामने अब बेटे को खोने का दुख है, कर्ज का बोझ है और अनगिनत सवाल हैं। सिति अख्तर के जीवन और परिवार की कहानी भी सामने आनी चाहिए। इन दोनों को हमारी संवेदना पाने के लिए किसी काल्पनिक प्रेमकथा का पात्र बनने की जरूरत नहीं है। वे इंसान थे। इतना ही पर्याप्त है ।
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Imagine a sitting Union Minister spreading fake news by posting an old unrelated video and linking it to protests. Modi is desperate now; his slaves have to resort to blatant fuckery to save what's left of his image. Not gonna work, Rijiju.
Congress party flags with the flags of Pakistan occupied Kashmir and Pakistan in London! These people think that gatherings of Anti-India gangs in London will intimidate the patriotic Indians. भारत कभी नहीं झुकेगा और भारत को भारत-विरोधी ताकतें कभी तोड़ नहीं सकतीं।
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चुनाव आयोग पर सवालों का जवाब माँगा जा रहा था, लेकिन उसकी जगह खबरें आ रही हैं कि अमित शाह ने विपक्ष को तोड़ने का इंतजाम कर लिया है! कांग्रेस को बड़ा झटका लगने वाला है! अखिलेश मान जाएंगे, पवार साथ आ जाएंगे, डीएमके सेट है और दूसरे दल भी कतार में हैं! जरा रुकिए। इनमें खबर कितनी है और अटकल कितनी? मेरे हिसाब से इस हलचल को देश की बहस का रुख मोड़ने की कोशिश के तौर पर देखना चाहिए। सवाल पूछा जा रहा था चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर। चर्चा शुरू हो गई मोदी-शाह की रणनीति और विपक्ष की कमजोरी पर। सरकार ने ही ये खबरें फैलवाई हैं, इसका प्रमाण हमारे पास नहीं है लेकिन इनसे राजनीतिक फायदा किसे मिल रहा है, यह समझना मुश्किल नहीं है। अभी मामला सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे का नहीं है। सवाल यह भी है कि चुनाव आयुक्त चुने कैसे जाते हैं और अपने काम के लिए जवाबदेह किसके सामने हैं? चुनने वाली समिति में प्रधानमंत्री हैं, प्रधानमंत्री के चुने हुए एक कैबिनेट मंत्री हैं और विपक्ष के नेता हैं। तीन लोगों में दो सरकार के। फिर विपक्ष के नेता की राय का सिवाय डिसेंट के क्या मतलब है? इसी व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी गई है। ऊपर से इसी कानून की धारा 16 है। यह मौजूदा और पूर्व चुनाव आयुक्तों को सरकारी कामकाज के दौरान किए गए कामों और कही गई बातों पर व्यक्तिगत दीवानी और आपराधिक मुकदमों से व्यापक सुरक्षा देती है। इसका मतलब यह नहीं कि आयोग के फैसले अदालत में चुनौती ही नहीं दिए जा सकते। सवाल यह है कि आयुक्तों की व्यक्तिगत जवाबदेही पर इतना बड़ा सुरक्षा कवच क्यों? इस प्रावधान की चुनौती पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आयोग से जवाब माँगा है। इन्हीं सवालों के बीच एकाएक कई कोनों से खबर आई कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों के लिए संसद की विशेष बैठक बुला सकती है। दूसरे दलों से संपर्क की खबर भी है। यहाँ तक बात खबर है। इसके आगे—कौन झुक गया, कौन टूट जाएगा और कांग्रेस को कितने वोल्ट का झटका लगेगा—इसकी अटकलों की भरमार है! याद रखिए कि संविधान का 131वां संशोधन विधेयक अप्रैल में लोकसभा में जरूरी बहुमत नहीं जुटा पाया था। अब उसे दोबारा आगे बढ़ाने की तैयारी की खबरें हैं। पिछली हार का जिक्र गायब है और अगली जीत का ऐलान पहले ही हो रहा है । लोकसभा में 360 वोट भी हर हालत में जरूरी नहीं हैं। संविधान संशोधन के लिए कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक और उपस्थित होकर वोट देने वालों के कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन चाहिए। यानी कोई दल सरकार को वोट दे तो फायदा, मतदान से दूर रहे तो भी फायदा हो सकता है। इसलिए किसी से बातचीत की खबर आते ही उसके सारे सांसद सरकार के खाते में जोड़ देना गलत है। DMK से बातचीत की खबर है, लेकिन उसका समर्थन तय नहीं है। पवार की पार्टी के आठ वोट भी पक्के नहीं हैं। अखिलेश मान गए, बेनीवाल का जाना तय है, कांग्रेस टूटने वाली है—इन दावों की सार्वजनिक पुष्टि कहाँ है? संपर्क होने और सौदा पूरा हो जाने में फर्क होता है। हाँ, मानसून सत्र की बैठकें 13 अगस्त को स्थगित होने के बाद उसका औपचारिक सत्रावसान न होने की खबर सही है। लेकिन इससे यह कैसे साबित हो गया कि सरकार के पास बिल पास कराने के वोट आ गए हैं? महिला आरक्षण और परिसीमन पर खुलकर चर्चा हो। सरकार नया प्रस्ताव सामने रखे। देश देखे कि किस राज्य की कितनी सीटें बढ़ेंगी और प्रतिनिधित्व का संतुलन कैसे बदलेगा। पार्टियाँ भी साफ बताएँ कि वे कहाँ खड़ी हैं। लेकिन इन खबरों के शोर में चुनाव आयोग वाले सवाल दबने नहीं चाहिए। आयुक्तों के चयन में सरकार का निर्णायक बहुमत क्यों? उनके लिए इतनी व्यापक कानूनी सुरक्षा क्यों? आयोग की निष्पक्षता पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा? संसद में सरकार कितने सांसद जुटा लेगी, यह पता चल जाएगा। फिलहाल सवाल यह है कि चुनाव आयोग जनता का भरोसा कैसे जुटाएगा। उसका जवाब विपक्ष में टूट की खबरें नहीं दे सकतीं।
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Exposing Republic TV Reporter : देखिए कैसे प्लान करके CJP नेताओं को परेशान करने पहुंचा रिपोर्टर
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देश के बहुत बड़े पत्रकार पीयूष पद्माकर कह रहे हैं कि टिकट कटने से नाराज होकर BJP के पूर्व विधायक सुरेश राठौर ने अंकिता भंडारी मर्डर केस में दुष्यंत गौतम का नाम लिया था। थोड़ा जानकारी दुरुस्त करना जरूरी है। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 14 फरवरी 2022 को हुआ। सुरेश राठौर BJP के ही प्रत्याशी थे, लेकिन हार गए। जबकि अंकिता भंडारी का मर्डर इस चुनाव के बाद 18 सितंबर 2022 को हुआ था। इसलिए सुरेश राठौर के टिकट कटने का कोई मामला ही नहीं था। अंकिता भंडारी मर्डर केस में आपकी नई–नई थ्यौरी पढ़कर आपके दोस्त नितिन नबीन रोज–रोज हैरान होते होंगे !!
#Dushyant_Gautam : उत्तराखंड के अंकिता मर्डर केस में वो VIP कौन है ? दुष्यंत गौतम का नाम कैसे आया? दुष्यंत के बारे में किसने फैलाया ? 1. @dushyanttgautam का नाम कैसे आया: क्या ये सच नहीं है उत्तराखंड के एक विधायक का टिकट दुष्यंत गौतम ने काटा। दुष्यंत गौतम उस वक्त उत्तराखंड बीजेपी के इंचार्ज थे। उस विधायक ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक ऑडियो रिकॉर्ड किया। सुनकर आप चौंक जाएंगे। पति विधायक और उनकी पत्नी एक ही जगह पर थे, कमरे में बैठे-बैठे उन दोनों ने बातचीत रिकॉर्ड की। और फिर वो ऑडियो फैलाया गया। क्या ये सच नहीं है उस विधायक ने अपने टिकट काटने का बदला दलित नेता दुष्यंत गौतम से लिया? पति विधायक और पत्नी ने सोच समझकर प्लान बनाया..और फिर दुष्यंत गौतम का नाम फोन पर लिया गया। 2. पुलिस को क्या पता चला: क्या ये सच नहीं है उत्तराखंड पुलिस की जांच में भी VIP का नाम दुष्यंत गौतम नहीं था। उस वक्त दुष्यंत गौतम की लोकेशन भी उत्तराखंड में नहीं थी। पुलिस ने तीन लड़कों को पकड़ा। अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई। दुष्यंत गौतम ने उन लोगों पर मानहानि का मुकदमा ठोंका जिन्होंने उनका नाम सोशल मीडिया पर लिखा था। एक भी व्यक्ति सबूत नहीं दे पाया। बस सबूत के नाम पर एक ऑडियो क्लिप घूमाया गया, जो एक विधायक ने अपने कमरे में बैठकर अपनी पत्नी के साथ बनाया था। उसे ये पसंद नहीं आया कैसे एक दलित लीडर ने उसका टिकट काट दिया। 3. सीबीआई के पास भी मामला गया। सीबीआई के पास भी वही ऑडियो क्लिप पहुंची। सीबीआई ने उस पूर्व विधायक और उसकी पत्नी को पूछताछ के लिए बुलाया। CBI जानना चाहती थी कैसे उन्हें पता चला कि वो VIP दुष्यंत हैं। उन्होंने कोई सबूत नहीं दिया। गवाही देने भी नहीं आए। सीबीआई के पास ना कोई सबूत है, ना कोई गवाह। ना कोई आधार। उत्तराखंड सरकार के पास डिमांड आई तो उन्होंने सीबीआई को कह दिया। सीबीआई को अभी तक कुछ नहीं मिला है। अब बताइए एक दलित लीडर को इसलिए जीवन भर सजा मिलती रहे क्योंकि उसने इंचार्ज रहते हुए अपनी पार्टी के एक विधायक का टिकट काटा और उस विधायक ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर उसका नाम एक मर्डर केस में ले लिया। सीबीआई आज भी इंतजार ही कर रही है, कोई सबूत , कोई गवाह..कोई नई जानकारी है तो सीबीआई के पास जाइए। सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप लिखने से क्या होगा।
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IDBI बैंक बिक गया  IDBI बैंक के 61% शेयर कनाडा के फ़ेयर फैक्स ग्रुप ने ख़रीदना का सौदा किया हैं. यह सौदा करीब ₹53 हज़ार करोड़ में हुआ है. केंद्र सरकार और LIC ने अपने शेयर फ़ेयर फैक्स को बेचेगी. दोनों के पास सौदे के बाद भी 34% शेयर रहेंगे.  IDBI बैंक के शेयर बेचना सरकार के लिए बड़ी सफलता है . इसे बेचने की कोशिश पिछले 5 सालों से हो रही थी. 2022 में एयर इंडिया के बाद कोई बड़ी कंपनी सरकार बेच नहीं पाई थी. सरकार बजट में हर साल सरकारी कंपनियों के शेयरों को बेचने का प्लान बनाती थी लेकिन यह काग़ज़ पर ही रह जाता था.
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His credentials keep changing in the media as per need. He was a ‘Sangh Vicharak’, then ‘Author’, then ‘Political Analyst’, then ‘Advisor to Manipur CM N. Biren Singh’, then back to ‘Political Analyst’, and now, ‘Exec Member of Harvard Club of India’. Adbhoot!
#WATCH | Delhi: Rajat Sethi, Executive Committee Member of the Harvard Club of India (the official alumni group of Harvard University), says, "As a member of the elected body of the Executive Council of the Harvard Club of India, which is the official alumni group of Harvard University alumni in India, I wanted to issue a clarification that certain individuals have gone ahead and issued a letter remarking on and making comments about the recent protest and the detention that followed. I wanted to issue a clarification that this is not the official position of the Harvard Club of India. Also, the charter and the mandate of the Harvard Club of India prohibit issuing any political statement on either its behalf or on behalf of Harvard University. Therefore, this clarification is to explain to the larger audience that certain individuals who happen to be alumni of Harvard University have issued the statement in their personal capacity. While we respect personal expression, that is not a substitute for institutional representation."
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A heartfelt message by a parent, K Sharad Haksar to Neha Bora. “When I got married, I knew I wanted only one child. And in my heart, I hoped it would be a girl. I was blessed with a daughter. The first time I held her, I made her a silent promise. You will never have to share my time. You will never have to wait for my attention. Whatever I have, you will get all of it. I had seen families with four or five children. Parents running from morning to night, and still some child was always left waiting. I also felt our country has too many people, and nature is paying for it. One child felt right. It felt responsible. For years, I never questioned it. Then this year, I saw Neha Bora. She is 29, a PhD student at JNU, a theatre artist from Khatima, a small town in the hills of Uttarakhand. When the NEET paper leak happened, she sat down at Jantar Mantar for students she did not even know. Children who had studied for years. Parents who had spent their savings on coaching and still lost. She did not eat for 23 days. She was 66 kilos when she started. She lost more than 7. Near the end, doctors were taking her blood three or four times a day. The night I read that, I could not sleep. I kept seeing my own daughter in her place. On a hot Delhi road. Thin. Tired. A doctor holding her wrist again. And I knew I would not be able to stand there and watch. I would have begged her to stop. But Neha did not stop until the work was done. And when it was over, she said her body had forgotten how to eat. It had to learn again, like a baby. Even then, still weak, she went to Bihar to meet more than 600 students who had been arrested. She did not go home to rest. She went to the ones who had stood by her. I am a dowser. Every day I work with energy. I have learned that anger is heavy. It burns out fast. Nobody can live on anger for 23 days without food. Only love can carry you that far. Then I read that her father was in the Army, and the family kept moving from one posting to the next. My wife's father was also in the Army. I never call him my father-in-law. To me, he is simply Papa. My wife studied in 13 schools. Thirteen first days. Thirteen times walking into a class where nobody knew her name. Thirteen goodbyes to friends she never saw again. Army children learn to smile, pack their bags and start again. Nobody asks them how much it hurts. I see that strength in my wife every day. I saw it in Neha too. In Ranchi, a man threw ink on her face and called her anti-national. She said she had already faced pellets and lathis in Delhi. Ink would not scare her. Ink washes off. In energy work, we say that what people throw at you only stays if you take it in. She seems to know this without ever holding a pendulum. Her family did not agree with her. There were fights at home. But during the hunger strike, her mother came to Jantar Mantar. I don't know what they said to each other. I don't need to. I am a parent. I know what a mother feels when she sees her child weak and thin on a road, and still standing. Every argument is forgotten in that moment. All that is left is: this is my child. Neha said she has not spoken to her father yet. I don't know him. But I am a father too, and I know how hard it is for men like us to say some things out loud. So if he cannot say it yet, let me say it for him, from Chennai. Beta, we are proud of you. Now go and eat something properly. Somewhere in all this, a thought came to me that I never expected. I wish I had one more daughter. One like Neha. This takes nothing away from my own daughter. She is my world. She always will be. But Neha made me ask myself a hard question. We spend our whole lives keeping our children safe and helping them get ahead. Do we ever teach them to look back at who is being left behind? And if one day they stand up for someone else, will we stand next to them as Neha's mother did? Or will we ask them to come home and stay quiet. Our job is to protect that light, even when it scares us.
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बच्चियों और बच्चों को दिल्ली पुलिस के सहयोग से पिछले दो दिनों से पीट रहे भगवा गुंडे अब कहां हैं जब कनाट प्लेस में इंडिया गठबंधन का जनसागर हिलोरें ले रहा है? ये शिखंडी कमजोर पर ही बहादुरी दिखाते हैं!
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Thousands gather to join Opposition leaders march from Barakhamba Road to the Supreme Court in Delhi LIVE updates: indianexpress.com/article/de…
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JUST IN | Lawyers make their way to join the protest march led by Rahul Gandhi in New Delhi on October 12, 2026. 📷@shashiskashyap
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MASSIVE : Burnol for BJP 😭 Neha Bora has also joined Rahul Gandhi’s CHALO DILLI and she is also traveling in the same bus with Opp MPs All Protests are One Protest ✊🔥
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दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है। जवाबदेही सिर्फ़ पुलिस की नहीं, गृह मंत्री की भी है। मांगें: 1. कल की हिंसा के सारे वीडियो की जांच हो। 2. हिरासत में लिए गए लोगों की सूची सार्वजनिक हो। 3. हिंसा करने वालों पर लगी धाराएं बताई जाएं। 4. पत्रकारों की हिरासत की स्वतंत्र जांच हो। लोकतंत्र में जवाब मांगना अपराध नहीं है। 7/7#DelhiPolice #CJPProtest
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BNSS 163 के तहत निषेधाज्ञा का मतलब है—सबके लिए समान पाबंदी। लेकिन कल कनॉट प्लेस में जो हुआ, वो "कानून-व्यवस्था" नहीं, चुनिंदा गुंडागर्दी थी। जिनके हाथ में डंडे थे, उन्हें रोका नहीं गया। जो शांति से बैठे थे, उन्हें उठाकर ले जाया गया।6/7
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पत्रकारों की हिरासत पर NHRC ने स्वतः संज्ञान लिया है। तीन महिला पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस कर्मियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं । जब खुद पुलिस पर आरोप हों, तो जांच पुलिस से कराना न्याय का मज़ाक है। स्वतंत्र जांच कब होगी?‌‌5/7
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हिंदू रक्षा दल का मुखिया पिंकी चौधरी खुलेआम कह रहा है—"ये मेरे वॉरियर्स हैं, मैं इन्हें बचाऊंगा" । यानी हमलावरों के पास पुलिस से भी बड़ा "संरक्षण" है। जिस पुलिस के सामने वीडियो बनाने वालों को थाने में डाला जाता है, उसी पुलिस के सामने ये लोग हिंसा करते हैं और बच निकलते हैं।‌4/7
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सबसे बड़ा सबूत: राहुल गांधी ने जब वो वीडियो शेयर किया, तब जाकर दिल्ली पुलिस को FIR करनी पड़ी। हिंदू रक्षा दल के 4 अपराधियों—रमन सैनी, विवेकानंद, कपिल कुमार, रविंदर सिंह—को गिरफ्तार करना पड़ा । सवाल: अगर राहुल गांधी का ट्वीट न होता, तो क्या ये गिरफ्तारियां होतीं? पुलिस की suo motu कार्रवाई सिर्फ़ दबाव में क्यों होती है?‌‌‌3/7
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सबसे शर्मनाक नज़ारा कल शाम कनॉट प्लेस में था। बड़े पैमाने पर बच्चियों और युवतियों के खिलाफ हिंसा हुई। एक वीडियो में साफ़ दिख रहा था कि दिल्ली पुलिस के जवान मौजूद थे, फिर भी हमलावर लड़की को घसीट रहे थे, मार रहे थे। क्या पुलिस प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा के लिए है, या हमलावरों को "फ्री हैंड" देने के लिए?2/7
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क्या दिल्ली पुलिस कानून लागू कर रही है ? BNSS की धारा 163 (पुरानी CrPC 144) लागू है। गैरकानूनी जमाव पर BNS 189 लगती है। सवाल सीधा है: जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बसों में भरकर दूर-दराज के थानों में क्यों पटका जा रहा है, जबकि हिंसा का आह्वान करने वाले दक्षिणपंथी समूह खुलेआम घूम रहे हैं? कानून सबके लिए एक है या नहीं? 1/7🧵
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