शिकायतें हैं? बिल्कुल हैं।
नाराज़गी है? हक़ से है।
माँगें भी रोज़ नई होंगी और
बहस भी तगड़ी होगी,
आख़िर लोकतंत्र है,
सरकार से सवाल नहीं करेंगे तो
किससे करेंगे?
लेकिन ज़रा ठहरिए…
इसका मतलब यह कतई नहीं कि अपनी ही नाराज़गी में आँखें मूँद लें और कुर्सी उन ‘महानुभावों’ की थाली में
सजाकर पेश कर दें:
* जिनके दौर में क्वात्रोची जैसे
विदेशी दलाल घर के दामाद बन
जाया करते थे।
* जो कल तक मुलायमजी प्राइमरी
स्कूल में खड़िया घिस रहे थे और
आज उनके वारिस विदेशों में सात
सितारा होटलों की मिल्कियत
संभाले बैठे हैं।
* लालू पुत्रों के लिए सत्ता का मतलब
सिर्फ़ पटना में देश का
सबसे बड़ा मॉल खड़ा करना,
और अपने विदेशी खातों की
सेहत सुधारना था।
मतभेद अपनी जगह, मगर देश की तिजोरी पर डाका डालने वाले 'पारिवारिक लुटेरों' और
बिना एक दिन की छुट्टी लिए
25 साल खपाने वाले फ़क़ीर में फ़र्क समझना इतना भी मुश्किल नहीं है।
नाराज़गी अपनी जगह है मित्रो, पर घर की पहरेदारी फिर किसी जेबकतरे के हाथ नहीं सौंपी जा सकती।
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