तथ्य और सच्चाई से परे, नैतिकता विहीन, कोई भी मनगढ़ंत और ऊलजलूल आरोप मढ़कर, भ्रम की स्थिति पैदा करके, बिना किसी जन-समर्थन के, कुछ अचानक से प्रकट होने वाले सिरफिरे यदि मुँह उठाकर आंदोलन करने की सोचते हैं, तो अल्पकालिक रूप से विपक्ष का बल मिलने से कुछ दिन थोड़ा दाएँ-बाएँ करके हो-हल्ला जरूर मचाते हैं लेकिन शीघ्र ही यह तथाकथित आंदोलन, पहले आण्डोलन और फिर आण्ड-दोलन बन कर रह जाता है और तदनन्तर आण्ड-दोलन का आयाम इतना बढ़ जाता है कि ठीक से चलना-फिरना, खड़ा होना कठिन हो जाता है, परिणामस्वरूप, भाषा बदल जाती है। अहंकार और उद्दण्डता बढ़ जाती है। गाली देना, चुनौती देना और रेजीम चेंज करवाने की चेतावनी/धमकी देना सब प्रारम्भ हो जाता है।
कुछ नास्तिक भोगवादी नवयुवतियाँ/मोहतरमाएँ, रील बनाने वाले साधन के साथ भीड़ में आकर सक्रिय हो जाती हैं, अधिक रीच और व्यूज पाने के लिये, पत्रकारों, प्रशासनिक अधिकारियों, इंसपेक्टर्स, व्यवस्था में लगे पुलिस-कॉन्स्टेबल्स आदि बलों को उकसाने, छेड़ने और भद्दी-गंदी गालियाँ दे-देकर उलझने और हाथापाई करने हेतु ये मोहतरमाएँ हर सम्भव प्रयास करती हैं और बाद में विक्टिम कार्ड वाला गेम भी खेलती हैं।
कुछ तो इतनी ढींठ, असभ्य और उद्दण्ड होती हैं कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, चुनाव-आयुक्त आदि को गालियों वाले नारे भी लगाने लगती हैं और बाद में, सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ विष-वमन भी खूब करती हैं। कुछ तो भीड़ को मेला समझते हुए पैसों के अत्यधिक लालच में, SC/ST एट्रोसिटी ऐक्ट लगाने के बहाने भी ढूढ़ते/ढूँढती हैं।
कुछ महात्वाकांक्षिणी वामपंथने तो बैरीकेडिंग पर चढ़कर, ऐसे-ऐसे भिन्न-भिन्न कोणों पर मूवमेंट्स करती हैं कि रील बनाने वाले कैमरा विशेषज्ञों के लिए विशिष्ट अंगावलोकन व नितम्बावलोकन सरल और सुलभ हो जाता है और तत्पश्चात् वायरल भी।
एक सफल और प्रभावी आन्दोलन के लिए आवश्यक है, राष्ट्रहित, सर्वसमाजहित और पीड़ित मानवता की सेवा की भावना के साथ एक कुशल और निःस्वार्थ नेतृत्व के मार्गनिर्देशन में भारी जनसमर्थन। लगातार शोषण करने, पक्षपात करने, भ्रष्टाचार-घोटाले करने और अराजकता, भय-हत्या-दबंगई-महगाई आदि के बढ़ने या नियंत्रण न कर पाने की स्थिति में, जनमानस में उपजे रोष के कारण, जो आन्दोलन किये जाते हैं वे अवश्य एक सुखद परिणाम तक पहुँचते हैं।
••• वन्देमातरम् 🙏