तथाकथित “कॉकरोच ब्रिगेड” ठोस और सार्थक मुद्दों पर संवाद करने के बजाय शोर, व्यवधान और राजनीतिक तमाशा खड़ा करने के लिए लगातार सक्रीय दिखाई दे रहे हैं। उनका विरोध प्रदर्शन चयनात्मक रूप से स्पष्ट है—विशेष रूप से उन राज्यों में जहाँ भाजपा की सरकार है—जबकि गैर-भाजपा दलों द्वारा शासित राज्यों में उनकी उपस्थिति उल्लेखनीय रूप से शांत दिखाई देती है। यह चयनात्मक सक्रियता एक बुनियादी सवाल उठाती है: क्या उद्देश्य वास्तव में लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा करना है, या केवल वहाँ भाजपा विरोधी टकराव एवं विवाद पैदा करना है ताकि अधिकतम राजनीतिक ध्यान आकर्षित किया जा सके? लोकतंत्र हर व्यक्ति को विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक जीवन में अराजकता, कानून-व्यवस्था की अवहेलना या जानबूझकर व्यवधान पैदा करने का लाइसेंस नहीं बन सकता।
और अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राष्ट्रीय महत्व और राष्ट्रीय गौरव से जुड़े मुद्दों पर उनका राजनीतिक जुड़ाव कांग्रेस पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी दलों के साथ दिखाई देता है। इस तथाकथित “कॉकरोच ब्रिगेड” का इस्लामी फासीवादी, कट्टरपंथी, जिहादी, मुल्ला, मौलाना और कठमुल्ला समूहों के प्रति आकर्षण, और साथ ही तथाकथित वामपंथी- उदारवादी- धर्मनिरपेक्ष- समाजवादी- नारीवादी- एलजीबीटीक्यू- प्रगतिशील ब्रिगेड के साथ नजदीकी, उस वैचारिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है जिसमें वे काम करते हैं। कॉकरोचों को न केवल आम आदमी पार्टी, कांग्रेस पार्टी और वामपंथियों द्वारा निर्देशित किया जा रहा है, बल्कि कथित तौर पर विदेशों में सक्रिय निहित स्वार्थ वाले समूहों द्वारा भी निर्देशित किया जा रहा है। स्वतंत्र आवाज बनाए रखने के बजाय, कॉकरोच ब्रिगेड तेजी से एक व्यापक विपक्षी राजनीतिक तंत्र की सहायक शक्ति के रूप में काम करती दिखाई दे रही है। प्रासंगिक बने रहने की उनकी हताशा इस हद तक है कि वे हर मुद्दे को टकराव में बदलने का प्रयास करते हैं।
इन समूहों द्वारा राष्ट्रीय प्रतीकों और परंपराओं से जुड़े विषयों को भी राजनीतिक तमाशे के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। संपूर्ण वंदे मातरम् का पाठ और गायन करने की नवस्वीकृत व्यवस्था का पालन करने से उनका इनकार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। साथ ही वे राष्ट्रीयता एवं सनातन- हिंदुत्व भावना से भी अपने देसी विदेशी आकाओं की तरह परहेज करते हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करने वाले किसी आंदोलन को राजनीतिक असहमति के बावजूद राष्ट्रीय भावना का सम्मान करने में सक्षम होना चाहिए। अंततः, कॉकरोच ब्रिगेड की सबसे बड़ी कमजोरी शोर पैदा करने की उसकी क्षमता नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प देने में उसकी असमर्थता है। लगातार विवाद एवं व्यवधान सुर्खियाँ तो पैदा कर सकता है, लेकिन वह विश्वसनीयता, निरंतरता या जनसमर्थन का विकल्प नहीं हो सकता। भारत को सशक्त असहमति की आवश्यकता है, लेकिन जबरन निर्मित अराजकता को लोकतांत्रिक सक्रियता के रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।
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