दुनिया ने सालों तक सोनिया गांधी की कहानी लिखी, कभी अपने हिसाब से, कभी अपनी नफ़रत के हिसाब से। अब पहली बार वो ख़ुद बता सकती हैं कि उस कहानी के पीछे की औरत ने आख़िर क्या-क्या सहा।
एक ऐसी महिला, जो अपना देश, अपना परिवार और अपनी दुनिया छोड़कर भारत आई।
राजीव गांधी के साथ जीवन बिताने के लिए उन्हें जितने साल मिले, उससे कहीं ज़्यादा साल उन्हें उनकी यादों के सहारे जीना पड़ा।
पति को खोने का दर्द, दो बच्चों की ज़िम्मेदारी और फिर एक ऐसे सार्वजनिक जीवन में उतरना, जहाँ उनके हर क़दम पर सवाल उठे।
उनकी राजनीति पर सवाल उठाइए, उनके फ़ैसलों की आलोचना कीजिए, ये लोकतंत्र है।
लेकिन किसी महिला की भाषा, उसके जन्म, उसके परिवार और उसके निजी दुख को निशाना बनाकर उसे अपमानित करना कैसी राजनीति है?
सालों तक उनके लिए कैसी-कैसी बातें कही गईं, कैसी-कैसी टिप्पणियाँ की गईं। क्या किसी इंसान को सिर्फ़ इसलिए अपमानित किया जा सकता है क्योंकि वो आपकी राजनीतिक पसंद का हिस्सा नहीं है?
सोचिए, जिस महिला के निजी जीवन में इतना बड़ा दुख आया, उसे उसी दुख के साथ जीने देने के बजाय दुनिया ने उसके लिए और कितने दर्द चुन लिए।
सोनिया गांधी कोई देवी नहीं हैं, न ही उनकी आलोचना से उन्हें ऊपर रखा जाना चाहिए।
वो भी एक इंसान हैं, जिनसे ग़लतियाँ हो सकती हैं, जिनके फ़ैसलों से असहमति हो सकती है। लेकिन इंसान होने का हक़ उनसे भी नहीं छीना जा सकता।
अब तक लोगों ने उनकी कहानी अपने शब्दों में सुनाई, उनके बारे में फ़ैसले सुनाए और उनकी ख़ामोशी को अपनी-अपनी तरह से समझा।
अब वो ख़ुद बोलना चाहती हैं, तो शायद उन लोगों को भी इंतज़ार करना चाहिए जिन्होंने सालों तक उनके बारे में सब कुछ कह दिया, लेकिन कभी ये जानने की कोशिश नहीं की कि उस इंसान ने भीतर क्या-क्या सहा होगा।
किसी की ख़ामोशी को उसकी कमज़ोरी मत समझिए। कभी-कभी इंसान जवाब इसलिए नहीं देता, क्योंकि वो अपने दुख को तमाशा नहीं बनाना चाहता।
अब उनकी कहानी उनकी ज़ुबानी सुनिए। फिर फ़ैसला कीजिएगा कि जिस महिला के बारे में दुनिया ने इतने सालों तक इतना कुछ कहा, उसकी अपनी आवाज़ सुनने का धैर्य हममें है भी या नहीं।
There’s bound to be some tamasha when this book comes out. After all, others have spent decades telling my “story”, now it’s my turn.