इस घटिया फिल्म पर अपने पैसे बर्बाद न करें...
वामपंथी एजेंडे से भरी हुई निहायत ही बकवास फिल्म "रामायण":-
रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश की फिल्म 'रामायण' दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस घटिया , शर्मनाक फिल्म ने सिनेप्रेमियों की दिवाली 2026 का स्वाद कसैला कर दिया है । फिल्म के कथानक को देखते हुए तो फिल्म के लेखक और निर्देशक पर मुकदमा चलना चाहिए
असल में निर्देशक नितीश तिवारी की यह फिल्म " रामायणा" शुरुआती दृश्यों में ही बताती है कि देवता इतने अत्याचारी हैं कि उनके आतंक के कारण राक्षस जाति दाने दाने को मोहताज है। वे भूखों मर रहे हैं, देवों के यहां मजदूरी कर रहे हैं पर परिवार का पेट भर सकने लायक अन्न नहीं जुटा पाते। बालक रावण को उसकी माता इस शोषण और अत्याचार के विरुद्ध खड़ा करती है, और वह अपना संगीत प्रेम त्याग कर शस्त्र उठाने पर विवश हो जाता है। वह तप कर के शक्ति प्राप्त करता है और लंका को कुबेर के शोषण से मुक्ति दिलाता है।
लंका का राजा बनने के बाद वह सामाजिक समानता की घोषणा करता है। वह तय करता है कि आज से राजा और प्रजा का जीवन एक सा होगा, भोजन और वस्त्र एक जैसे होंगे। लंका में साम्यवाद स्थापित होता है।
इतना ही नहीं, रावण स्त्रियों का बहुत आदर करता है और अपने दरबार में स्त्री अधिकारों की वकालत करता है।
अब रामजी की ओर चलिए। जनकपुर में राम वाटिका में सिया के साथ बैठे हैं। विवाह तय हो चुका। राम हँस कर सिया से पूछते हैं कि मेरा तो हो चुका, मेरे भाइयों का क्या होगा?मुस्कुराती सिया कहती हैं कि पीछे देखिए। कैमरा घूमता है तो दर्शक देखते हैं लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न एक एक राजकुमारी के साथ अलग अलग बैठे बातें कर रहे हैं। दर्शक खिलखिला उठते हैं। कुछ नई उम्र के फूहड़ दर्शक तो सीटियां भी बजाते हैं। यह रामायणा है......
रामकथा बहुत बड़ी है इसलिए फिल्म बनाते समय कुछ दृश्यों को छोड़ना ही पड़ेगा। इसी बहाने से निषादराज गुह का पूरा प्रसंग ही हटा दिया गया। क्षत्रिय राम और निषाद गुह की मित्रता साम्यवादी एजेंडे को सूट नहीं करती न, तो बेहतर है कि इस प्रसंग को ही छोड़ दिया जाय। अच्छा है न?
अभी रुकिए। राजकुमारी शूर्पणखा वन में घूमती रहती है। राम से मित्रवत तरीके से मिलती है, उनसे प्रभावित होती हैं। अगली भेंट में विवाह प्रस्ताव देती हैं जिसे राम नकार देते हैं। तीसरी बार वे सीता के भेष में राम से कुटिया में मिलती हैं, जिसपर संदेह होने के कारण लक्ष्मण उनकी नाक काट देते हैं। इसपर माता सीता क्रोधित हो जाती हैं कि तुमने ऐसा दण्ड क्यों दिया? इसके बाद जब खर दूषण सेना सहित आते हैं तो इस बात के लिए राम उनसे क्षमा याचना भी करते हैं। यह नीतीश तिवारी की रामायणा है।
इस रामायणा में रावण और उसका परिवार आपको आदर्श साम्यवादी व्यवहार करता मिलता है। जनवादी, साम्यवादी, नारीवादी रावण... वे न अत्याचारी हैं, न ऋषियों को कष्ट देते हैं, न किसी का कुछ बिगाड़ते हैं। एकदम जेंटिलमेन... है न मजेदार?
सनातनी पौराणिक कथाओं को जब धूर्त वामी छूते हैं तो वे उसका नाश ही करते हैं। इस फिल्म में भी वही किया गया है। देवदत्त पटनायक या बोधिसत्व जैसे लम्पट जीवन भर यही करते रहे हैं, यही करते रहेंगे।
वामपंथी एजेंडे से भरी हुई निहायत ही बकवास फिल्म है यह। धूर्तता के नए मानदंड स्थापित करने वाली फिल्म है यह । हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाली फिल्म है यह ।
सादर/साभार
सुधांशु
(आदरणीय सर्वेश जी भाईसाहब)
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