जो भी इन पेज को चला रहे थोड़ा अपना विवेक बुद्धि लगाए , पुष्यमित्र जी ने क्या लिखा उनका अपना मानना है, दरभंगा आपके सामने उदाहरण है ILS अब जाकर इंस्टॉल हो रही , ५ साल नहीं लगा , ५ साल पोर्टा केबिन में ही चला जरा देखे जाकर बिहार ही नहीं उड़ान योजना का सबसे सफल एयरपोर्ट यही है ।
पीएम मोदी ने कल इस एयरपोर्ट टर्मिनल को रिकार्ड पांच महीने में तैयार हुआ बताया था. सच्चाई यह है कि यह पूर्णिया एयरपोर्ट का स्थाई टर्मिनल नहींं है. यह एक पोर्टेबल टर्मिनल(पोटा केबिन) है, जहां से आनन-फानन में दो विमानोंं के उड़ने की व्यवस्था की गई है. यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि इसकी घोषणा 2015 में हुई थी, दस साल बाद बना भी तो स्थाई नहीं बना है.
स्थाई टर्मिनल का कल शिलान्यास होना था, मगर किसी तकनीकी कारण से यह टल गया. अभी इसके बनने में काफी वक्त लगना है. एयरपोर्ट चालू हो गया है, मगर इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम नहींं लगा है. इसके लिए 16 एकड़ जमीन चाहिए. इसके बिना दिसंबर-जनवरी में कोहरा न विमान को उड़ने देगा, न उतरने.
सबसे बड़ी दिक्कत तो यह है कि पूर्णिया वाले इस एयरपोर्ट से दिल्ली जाना चाहें तो कोई सीधी उड़ान नहींं है, कनेक्टिंग फ्लाइट है. जिसमें वक्त और किराया दोनों काफी अधिक लगेगा. जाहिर है, सबकुछ जल्दबाजी में किया गया है. मकसद चुनाव है. सच्चाई यह है कि इस एयरपोर्ट को सुुव्यवस्थित होने में अभी काफी वक्त लगेगा.
हालांकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है. इस एयरपोर्ट के लिए जिस गोआसी गांव के किसानों की जमीन उनकी मर्जी के बगैर ले ली गई है. उनके मुआवजे का मसला भी सुुलझा नहीं है. उनमें सेे कई बेघर हो गये हैं. विरोध करने वाले किसानों पर दलित प्रताड़ना का मुुकदमा डाल दिया गया है. ज्यादातर किसानों ने मुआवजा नहीं लिया है. मामला अदालत में है.
उड़ान की खुशियों के पीछे कई सवाल दरकिनार हो गये हैं. इन सवालों को समेटते हुए यह स्टोरी लिखी है – पुष्य मित्र सर ने।