A simple man, who wants to live in a society where justice prevails..If not, i will fight for it till my end.

Delhi
ज्ञानेश कुमार का इस्तीफ़ा लेकर रहेंगे!! 📍Jantar Mantar 🗓️ 10 October, Sunday
𝟏𝟎 𝐎𝐜𝐭𝐨𝐛𝐞𝐫, 𝐉𝐚𝐧𝐭𝐚𝐫 𝐌𝐚𝐧𝐭𝐚𝐫 📢
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जो जनता के दिल में जगह नहीं बना पाते, वो चुनाव से पहले एजेंसियों के छापे भेजते हैं। पंजाब झुकना नहीं, जवाब देना जानता है। किसान आंदोलन से लेकर पंजाब के हक तक, दिल्ली ने हमेशा धोखा दिया। अब मुख्यमंत्री के ऑफिस पर CBI की रेड हार के डर से उपजी बौखलाहट है—जिसका हिसाब पंजाब 100+ सीटों के जनादेश से चुकता करेगा। जब बैलेट से जीतने का दम न रहे, तब एजेंसियां आगे की जाती हैं। मोदी जी और BJP यह याद रखे, यह पंजाब है; डराने की हर साज़िश यहाँ भारी बहुमत में बदल जाती है।
ਭਾਜਪਾ ਵੱਲੋਂ ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਚੋਣਾਂ ਦੀ ਤਿਆਰੀ ਸ਼ੁਰੂ..ਮੇਰੇ ਕੈਂਪ ਆਫ਼ਿਸ ਵਿੱਚ CBI ਰੇਡ ਕੀਤੀ ਗਈ..ਹੁਣ ਪੰਜਾਬ ਵਿੱਚ ED ਤੇ CBI ਦੀ ਦੁਰਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇਗੀ..ਤਾਂ ਕਿ ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਅਤੇ ਮੈਨੂੰ ਬਦਨਾਮ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ..ਲੋਕਾਂ ਵੱਲੋਂ ਮਿਲਦੇ ਪਿਆਰ ਨੂੰ ਦੇਖਕੇ ਭਾਜਪਾ ਘਬਰਾਹਟ ਵਿੱਚ ਹੈ..
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पूरा देश एकजुट होकर ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहा है। पिछले कुछ सालों से मोदी जी SIR के जरिए असली वोट कटवाकर और फर्जी वोट जुड़वाकर चुनाव जीतते आए हैं। इन लोगों ने लोकतंत्र का मजाक बना दिया है। मैं देश में वोट चोरी के खिलाफ चल रहे आंदोलन का समर्थन करता हूं। ज्ञानेश कुमार, इस्तीफ़ा दो
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भाईसाहब आपने ख़ुद को गांधीयन लिखा है,काम आप संघियों की तरह अफ़वाह फैलाने का कर रहे हैं, कुछ लिखने से पहले पता तो कर लेते कहाँ का वीडियो है? मैं और प्रियंका गाँधी जी One Nation One Election की JPC में हैं आज उसकी मीटिंग थी और ये मीटिंग से बाहर निकलने की वीडियो है। अफवाहों से बचें।
संजय सिंह का अचानक प्रियंका गांधी के साथ दिखाई देना एक बहुत बड़ा संकेत है क्या संजय सिंह उत्तरप्रदेश के चुनाव के चलते एक बहुत बड़ा फैसला लेने जा रहे है राजनीति में एक दिन भी बहुत बड़ा होता है आगे आगे देखिए क्या होता है #घोरकलजुग
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This is one of the strongest reasons why the common citizens is losing faith in the #SupremeCourt to deliver justice, uphold the values enshrined in the Constitution of India.
Justice Nariman laments that the removal of 90 lakh voters in Bengal did not move the Supreme Court enough to stay the SIR process. "In West Bengal elections, 90 lakh voters were disenfranchised; that is an astounding figure. 90 lakh voters getting disenfranchised did not somehow move the Supreme Court enough to stay this. Out of those who were disenfranchised, some 22 lakh voters actually filed appeals. The others must be people who don't have the wherewithal for access to justice. And of these 22 lakh voters, some 1 lakh voter appeals were decided 93% in favour of the voters. So, you can imagine this was a completely illegal knocking out of the common man, the citizen of India, in order that a government obtains what it wants. And in West Bengal, we saw, it ousted the Government of the day and brought in the Government of the Centre . Now, these are very very disturbing things that are happening in our country today."
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ਮਾਂਵਾਂ ਦੀਆਂ ਅਸੀਸਾਂ ਹੀ ਸਾਡੀ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਡੀ ਤਾਕਤ ਨੇ। ਤੁਹਾਡੀ ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬ ਪ੍ਰਤੀ ਸਮਰਪਣ ਸੱਚਮੁੱਚ ਸ਼ਲਾਘਾਯੋਗ ਹੈ। ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਬਖ਼ਸ਼ਣ! 🙏✨
ਬੇਬੇ, ਤੈਨੂੰ ਮਿਲ ਕੇ ਰੂਹ ਨੂੰ ਸੱਚਾ ਸਕੂਨ ਮਿਲ ਗਿਆ… ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਤੇਰੀ ਇਸ ਮੁਸਕਾਨ ਨੂੰ ਇਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬਰਕਰਾਰ ਰੱਖੇ। ਤੇਰਾ ਇਹ ਪੁੱਤ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸੇਵਾ ਲਈ ਹਮੇਸ਼ਾ ਡਟਿਆ ਰਹੇਗਾ। ਪੰਜਾਬ ਦੀਆਂ ਸਭਨਾਂ ਮਾਵਾਂ-ਭੈਣਾਂ ਦਾ ਦਿਲੋਂ ਧੰਨਵਾਦ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਤਿਕਾਰ ਯੋਜਨਾ ਨੂੰ ਵੱਡੇ ਪੱਧਰ ‘ਤੇ ਸਫ਼ਲ ਬਣਾਇਆ। ________ My Revered Mother, meeting you today has brought true peace to my soul. May Waheguru always keeps this smile on your face. Your son will always remain steadfast in the service of Punjab. Gratitude and blessings for all the mothers and sisters of Punjab who made the 'Satkar Yojana' a huge success.
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#WATCH | Mumbai: Supporters of MNS chief Raj Thackeray and Shiv Sena (UBT) chief Uddhav Thackeray gather in large numbers near Metro Cinema. Both are leading a joint protest march toward the BMC headquarters against Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar.
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जब आम आदमी जागता है तो बड़े बड़े सिंहासन डोल जाते हैं!
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If Gyanesh Kumar doesn’t resign, cockroaches from across India will march to Delhi & protest at Jantar Mantar on October 10. If Delhi Police tries to stop us, wherever they stop us will become our Jantar Mantar.. Ours will be a peaceful andolan. We will walk on the path shown by Mahatma Gandhi. It is up to the Govt & the Delhi Police whether they respect our right to peaceful protest or repeat the brutality we witnessed on July 20. This is a fight to save our democracy. Every citizen who wants free & fair elections must join.
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महात्मा गांधी जी की जयंती और लाल बहादुर शास्त्री जी की जयंती पर कोटि-कोटि नमन 🙏
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📍 2 अक्टूबर, सुबह 10:00 बजे 📍 स्थान: जंतर-मंतर, नई दिल्ली क्या देश में लोकतंत्र सच में ज़िंदा है, या सिर्फ कागजों पर रह गया है? हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, जहाँ जनता तय करती है कि देश का सांसद और विधायक कौन बनेगा। लेकिन आज BJP और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तय कर रहे हैं कि चुनाव कौन जीतेगा। अब खामोश बैठने का वक्त नहीं है। लोकतंत्र बचाने के लिए जंतर-मंतर पहुँचिए! #jantarmantar #gyaneshkumarmustresign #votechori
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एक ही थप्पड़... लेकिन दो अलग-अलग कानून ? #ArrestParveshVerma
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आज़ादी के आंदोलन का प्रतीक तिरंगा था। कॉंग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को देशवासियों से तिरंगा फहराने की अपील की, लेकिन RSS प्रमुख डॉ.हेडगेवार जी ने शाखा प्रमुखों से शाखाओं में RSS का झंडा भगवा फहराने की अपील की,इसी झंडे को राष्ट्र ध्वज लिखा। @LeherSethi द्वारा लिखी गई किताब Saffron Shadows के विमोचन में ये बात सामने आई।
“Show me where I misquoted it. I’ll apologise on Twitter.” AAP MP Sanjay Singh (@SanjayAzadSln) pushed back after Shantanu Gupta accused him of misquoting the RSS-linked Organiser during the launch of Leher Sethi’s (@LeherSethi) Saffron Shadows. Singh challenged the allegation of misquoting and reiterated his argument over the RSS’s history with the national flag, including his claim that the Tricolour was not hoisted at the RSS headquarters for decades. The exchange points to a larger debate over the RSS’s historical record, the national flag and how that history is interpreted today. #SanjaySingh #RSS #NationalFlag #LeherSethi #AAP #BJP
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अंग्रेज कलकत्ता से दिल्ली लाइब्रेरी ले आए थे, लेकिन मोदी सरकार दिल्ली के अंदर ही 8.5 लाख किताबों वाली 135 साल पुरानी लाइब्रेरी को सेंट्रल विस्टा में जगह नहीं दे रही। शास्त्री भवन की इस ऐतिहासिक library को पहले सिर्फ़ दो कमरे दिए गए अब वो भी रिजेक्ट कर दिए गए हैं।
135-year-old library, 8.5 lakh books – and no room in the new Central Vista plan Read: indianexpress.com/article/in…
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अश्विनी कुमार से जुड़ा एक और किस्सा… अश्विनी कुमार वही हैं जिन्होंने तीन साल पहले बतौर डिविज़नल कमिश्नर, दिल्ली के तत्कालीन मुख्यसचिव नरेश कुमार के बेटे का बचाव किया था, भ्रष्टाचार के मामले में! फ़िलहाल इनके बेटे को एक महिला के साथ दुर्व्यवहार के मामले में दिल्ली पुलिस बचा रही है, ऐसा आरोप है पीड़िता की माँ का! यानि नरेश कुमार के बेटे का बचाव अश्विनी कुमार करते हैं, और अब अश्विनी कुमार के बेटे का बचाव दिल्ली पुलिस कर रही है! ग़ज़ब भाईचारा है दिल्ली की ब्यूरोक्रेसी में, भतीजों की “करतूतों” पर पर्दा अच्छे से डालते हैं! नरेश कुमार के बेटे की कंपनी ने कुछ ज़मीन किसानों से ख़रीदी थी, जो कि द्वारका एक्सप्रेसवे के लिए NHAI ने अधिग्रहित की। मुआवज़े की जितनी राशि सरकार ने तय की, उससे कई गुना ज़्यादा पैसा इस कंपनी को देने का आदेश दिल्ली के एक DM ने बतौर अपीलेट अथॉरिटी दिया! आरोप था कि संबंधित DM का आदेश नरेश कुमार, तत्कालीन मुख्य सचिव से प्रभावित था! ये आरोप बेबुनियाद है, इसकी गवाही देने के लिए अश्विनी कुमार ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की थी! अमूमन कोई IAS अधिकारी अपने बॉस के बचाव में प्रेस कांफ्रेंस नहीं करता, पर अश्विनी कुमार ने किया! नतीज़ा, भूमि अधिग्रहण में नरेश कुमार के बेटे की कंपनी को फ़ायद हुआ की नहीं, अगर हुआ तो उसमे नरेश कुमार की कोई भूमिका थी या नहीं, इसकी जाँच किसी एजेंसी ने नहीं की! मामला दब गया, या यूँ कहिए दफ़न हो गया! वक़्त बीता, कुछ महीने बाद अश्विनी कुमार MCD के कमिश्नर बना दिए गए। जून 2024 से फ़रवरी 2026 तक वो इस पद पर बने रहे। अश्विनी कुमार के कार्यकाल में ही बीजेपी ने अप्रैल 2025 में फ़िर से जोड़तोड़ करके MCD में अपनी सरकार बना ली! वैसे ये वही MCD है जिसे बीजेपी ने पिछले बीस सालों में भ्रष्टाचार का अड्डा बना दिया है। और ये वही MCD है जो अभी सत्य निकेतन में गिरी बिल्डिंग और उससे हुई सात छात्रों की मौत की ज़िम्मेदार है! वैसे पिछले दो सालों में दिल्ली में बिल्डिंग गिरने की 34 घटनाएँ हो चुकी है, जिसमें 90 जानें गई हैं! यानि अश्विनी कुमार जैसे अधिकारी अपने पद का इस्तेमाल सिर्फ़ ख़ुद के बेटे को बचाने के लिए करते हैं, न कि आम जनता के बेटे-बेटियों को सुरक्षित रखने के लिए! शायद इसीलिए IAS को “स्टील फ्रेम ऑफ़ इंडिया” कहते हैं…
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सभी देशवासियों के नाम खुला पत्र क्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? यदि हाँ तो कृपया जागे और देखे। SIR - मतदाता सूचि के विशेष पुनरीदान - के नाम पर वोटरों को मतदाता सूची से काट कर लोकतंत्र पर प्रहार किया जा रहा है। - विशेष पुनरीदान के नाम पर कानून का उल्लंघन कर अभी तक 13 करोड़ मतदाताओं को मतदाता सूची से निकला गया है। इनमे से 99 प्रतिशत गरीब भारतीय नागरिक है। • कानून की धारा 21 के अनुसार, विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष कारणों से ही किया जाना है और वह भी केवल किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से में तथा प्रत्येक मामले में विषिस्ट कारणों को लिखित रूप में उल्लेख किया जाना है। अतः पुरे देश में एक साथ विशेष पुनरीक्षण (Intensive Revision) का आदेश अवैध था। विशेष परिस्थितियों के लिए किया गया अपवाद स्वस्वरूप प्रावधान सामान्य नियम नहीं बन सकता। SIR विशेष गहन पुनरीक्षण को कानूनन ठहराने वाला सुप्रीम कोर्ट का आदेश गलत था। एक प्रश्न यह भी है कि पूरे देश में SIR का निर्णय किसने लिया? क्या यह पूरे आयोग का निर्णय था या केवल ज्ञानेश कुमार का? • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of The People Act 1950) की धारा 21 के अनुसार जब किसी मतदाता सूची (Electoral Roll) का पुनरीक्षण शुरू किया जाता है, तो पुनरीक्षण की अधिसूचना जारी किए जाने के समय लागू मतदाता सूची तब तक प्रभावी रहती है जब तक पुनरीक्षण समाप्त होने की उपरांत नई मतदाता सूची प्रकाशित नहीं हो जाती है। पुनरीक्षण तभी पूर्ण मानी जाती है जब नाम जोड़ने या हटाने के संबंध में दायर सभी अपीलों का निपटारा हो जाए। जहाँ अपीलें लंबित थीं, वहाँ पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई थी, अतः पुनरीक्षण के पूर्व वैध मतदाता सूची का ही उपयोग किया जाना था। इसके विपरीत, पुनरीक्षण में तैयार की जा रही नई मतदाता सूची - जो उस समय अपूर्ण थी चूँकि लाखों अपील लंबित थी उसका उपयोग चुनाव हेतु किया गया। यह अवैध था। • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को है, किसी अन्य व्यक्ति को नहीं; और वह भी केवल धारा 22(a), (b) और (c) में दिए गए कारणों के आधार पर विशिष्ट जांच करने तथा संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर दिए जाने के उपरांत ही आदेश पारित करके और उस आदेश के विरुद्ध अपीलों के निपटारे के बाद ही नाम हटाया जा सकता है। ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद मतदाता सूची में ERO द्वारा वैध तरीके से जोड़े गए सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जांच और पंजीकृत मतदाताओं को कोई कारण बताओ नोटिस दिए बिना हटा दिया। यह स्पष्ट रूप से अवैध था। जिन व्यक्तियों के नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटा दिए गए, उन्हें नए मतदाता के रूप में फॉर्म 6 भरकर आवेदन करना पड़ा और यह प्रमाण देना पड़ा कि वे पंजीकरण के पात्र हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय के Lal Babu Hussain and Others v. Electoral Registration Officer and Others, [(1995) 3 SCC 100] के फैसले का स्पष्ट उल्लंघन है। इस फैसले में कहा गया था कि किसी पंजीकृत मतदाता को अयोग्य ठहराने के दावे के समर्थन में आवश्यक साक्ष्य जांच प्राधिकारी द्वारा या आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत करना होगा, न कि मतदाता को; और ऐसे मामलों में मतदाता को अवसर दिया जायगा कि जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत आधारों पर अपनी प्रतिक्रिया दे और उसके उपरांत मतदाता पंजीकरण पदाधिकारी द्वारा सुनवाई कर लिखित आदेश दिया जाएगा। इनमें से कुछ भी नहीं किया गया। स्थापित न्यायिक सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार की अयोग्यता या दंड लगाए जाने के लिए पर्याप्त आधार होने का प्रमाण देने का भार उस व्यक्ति या संस्था पर होता है जो वह दंड या कार्रवाई करना चाहती है। ज्ञानेश कुमार ने प्रमाण का भार उलट दिया है। यह भी कानून के विरुद्ध है। अब तक सभी सरकार और निर्वाचन आयोगों के प्रयास हमेशा रहा है कि सभी पात्र मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाए। यह लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का मिशन था। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि पुनरीक्षण का मकसद अधिक से अधिक मतदाताओं को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करना बन गया। ज्ञानेश कुमार ने फॉर्म छे में एक नया परिशिष्ट (Appendix) जोड़ दिया। उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि फॉर्म 6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है। उन्होंने यह परिशिष्ट दोनों निर्वाचन आयुक्तों की राय के विरुद्ध जोड़ा। कानून के अनुसार आयोग के निर्णय या तो सर्वसम्मति से लिए जाने है अथवा बहुमत से। इस मामले में दोनों निर्वाचन आयुक्त इस नए परिशिष्ट को जोड़ने के खिलाफ थे। इसलिए नया परिशिष्ट जोड़ना स्वयं आयोग के निर्णय के विरुद्ध था। फिर इसे कैसे जोड़ा गया और किसके आदेश पर यह सवाल है। यह परिशिष्ट अभी भी लागू है। इस परिशिष्ट में मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदक से कहा गया है कि वे यह बताये कि 2003 की मतदाता सूची में उनके माता पिता का नाम किस क्रमांक पर था। ज़रा सोचें कि 18 वर्ष का कोई युवा—2003 की मतदाता सूची कैसे उपलब्ध कर सकता है? इससे सभी युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधा उत्पन्न हुई। BJP जानती है कि युवा मतदाता उसे वोट नहीं देंगे। फॉर्म 7 में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने के विरुद्ध आपत्तियाँ दी जा सकती हैं। बड़ी संख्या में एक साथ सैकड़ों, हजारों, लाखों आपत्तियां फॉर्म 7 में दाखिल की गईं। इन्हें किसने दाखिल किया? जिन लोगों का इन पर हस्ताक्षर है, वे स्वयं उपस्थित नहीं हुए। फिर इन फॉर्मों को कैसे स्वीकार किया गया और उन पर कार्रवाई कैसे की गई? ये आपत्तियां किसी राजनितिक दाल द्वारा थोक में जाली दस्तखत कराकर कराई गयी होगी। उन्हें बिना सवाल किये स्वीकार कर लिया गया और उसके आधार पर मतदाताओं का पंजीकरण रोका गया। यह सरासर धांधली थी। बंगाल में ERO द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं के नाम पंजीकृत नहीं किए गए क्योंकि किसी ने उनके विरुद्ध अपीलें दाखिल कीं। किस ने या किन लोगों ने अपील दायर किया यह स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि आयोग ने खुद अपील दायर किया। आयोग मतदाता के पंजीकरण के विरुद्ध अपील दायर करे यह अप्रत्याशित है। आयोग को अपील दाखिल करने का अधिकार किसने दिया? दो निर्वाचन आयुक्तों का कहना है कि उन्होंने ऐसा करने का निर्देश नहीं दिया। इसलिए आयोग ने किसी को अपील दाखिल करने के लिए अधिकृत नहीं किया था। फिर यह किसने अपील दायर किया? ज्ञानेश कुमार ने? इस आधार पर उन मतदाताओं को चुनाव में मतदान करने से रोक दिया गया। यह गंभीर धांधली है। क्या निर्वाचन आयोग और किसी राजनीतिक दल के कुछ लोग मिलीभगत करके बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म 7 की आपत्तियाँ दाखिल करवा रहे थे और नाम हटवा रहे थे? जब लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित थीं, तब चुनाव कैसे होने दिए गए? निर्वाचन आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को इसका जवाब देना होगा। जिन अपीलों का अब तक निपटारा हुआ है, वे दिखाती हैं कि जिन मतदाताओं को बाहर रखा गया था, उसमे 90 प्रतिशत वैध मतदाता थे। एक हास्यास्पद बात सामने आई है। अब मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के ERO के आदेश पर कंप्यूटर भी आपत्ति कर पंजीकरण रोक देता है। इसको कहा गया है "logical discrepancy"। यह बताया गया है कि पिता और पुत्र में 15 वर्ष से काम का अंतर "logical discrepancy" है। ज्ञानेश कुमार को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भारत में गरीब लोग कैसे रहते हैं। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होते। आज़ादी के इतने वर्षो बाद भी हमारे अधिकांश गरीब मतदाता अनपढ़ है। उनके घरों में कैलेंडर नहीं होते। जब BLO उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने के लिए उनके पास जाता है तो वे अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताते है। इसी प्रकार, जब उनके पिता के नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज किया गया तब उन्होंने भी अपने जन्म का वर्ष अंदाजे से बताया था। इसमें एक दो वर्ष इधर उधर होंगे। उसे logical discrepancy बताकर मतदाता सूची में उनका पंजीकरण रोक देना - जब कि वह व्यक्ति आपके सामने है, व्यस्क है तथा भारतीय है गरीब के साथ अन्याय है। कंप्यूटर द्वारा "logical discrepancy" बताये जाने के आधार पर लाखों लोगों के नाम बिना किसी जांच के हटा दिए गए। यह अधिनियम की धारा 21 के सरासर विरुद्ध है। सबसे अधिक संख्या में बाहर किए गए लोग गरीब और वंचित वर्गों से हैं—वे लोग जिनकी कोई आवाज नहीं है। वे अपने घरों से दूर रहकर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। लाखों लोग दूर-दराज के स्थानों/राज्यों में काम कर रहे हैं। वे अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक महीने के लिए अपने घर वापस जाने का खर्च नहीं उठा सकते। यदि वे काम नहीं करेंगे तो भूखे रह जाएंगे। वे जटिल फॉर्म नहीं भर सकते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र और आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं। वे वोट के लिए अपनी रोज की मजदूरी का नुकसान उठाना नहीं चाहते हैं। अधिकतर इन गरीब लोगों का नाम मतदाता सूची से काट दिया गया। इससे विदेशी नहीं छंटे। विदेशी नागरिक जो अवैध रूप से भारत आये है वे सबसे पहले अपने कागजात - आधार कार्ड/राशन कार्ड - बनवा लेते है। निर्वाचन आयोग में बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया। ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूची को कंप्यूटर पर डाल कर उस डिजिटल मतदाता सूची पर पूरा नियंत्रण अपने तथा अपने अधीन एक पदाधिकारी द्वारा कर रखे है। उस डिजिटल मतदाता सूची पर बाकी दोनों चुनाव आयुक्त को कोई अधिकार नहीं है। जो Electoral Registration officer - मतदान पंजीकरण पदाधिकारी मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का आदेश पारित करते है - अथवा उनके अपीलीय पदाधिकारी आदेश पारित करते है वे लागू होंगे या नहीं यह आयोग तय करता है। ERO के आदेश के बाद भी logical discrepancy के नाम पर मतदाता के नाम नहीं दर्ज जाते है। यह कानून के विरुद्ध है। कानून के अनुसार नाम जोड़ने या हटाने और मतदाता सूची प्रकाशित करने का अधिकार केवल निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को दिया गया है। इसके विपरीत, मतदाता सूची को केंद्रीकृत कर दिया गया और मतदाता सूची का पुनरीक्षण भी केंद्रीय स्तर पर किया गया। यह अवैध था। दोनों निर्वाचन आयुक्तों को ERO तथा DEO और CEO, जो कानून द्वारा मतदाता सूची मई नाम जोड़ने या हटाने के लिए अधिकृत है ने बताया कि उनको मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने नहीं दिया जा रहा है। गोवा में 97 मतदाताओं को वैध और मतदाता सूची में शामिल किए जाने योग्य पाया गया। वहाँ के ERO, DEO तथा CEO मतदाता सूची में उनका नाम शामिल नहीं करवा पाए हैं। मतदाता सूची में संशोधन का केंद्रीकरण गैर कानूनी एवं खतरनाक है। इसका उपयोग उन बूथों से मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया जा सकता है जो किसी पार्टी विशेष के विरुद्ध मतदान करते हैं। क्या ऐसा ही हुआ? बिना जांच तथा सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है और ज्ञानेश कुमार इसके लिए दोषी हैं। SIR के माध्यम से अब तक 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। यह कुल मतदाताओं का 13% है और SIR अभी समाप्त नहीं हुआ है। 2024 के चुनावों में NDA और INDIA के बीच अंतर केवल 3% था। इसलिए इन नामों को हटाए जाने का चुनावों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और पड़ेगा। 26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी प्रेस नोट ऊपर बताए गए अवैध कार्यों की पुष्टि करता है। प्रश्न है कि ज्ञानेश कुमार ने ये सभी अवैध कार्य स्वतः किए या किसी ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया? विपक्ष का कहना है कि वह ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाएगा। यह व्यर्थ होगा। इसके लिए विपक्ष के पास आवश्यक संख्या नहीं है। यदि वास्तव में उन्हें निष्पक्ष चुनाव चाहिए, तो उन्हें ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज कराने चाहिए, तथा सभी विपक्षी दल एकजुट होकर निश्चय करें कि वे तब तक किसी भी चुनाव में भाग नहीं लेंगे, जब तक कि वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त इस्तीफा नहीं देते और उनके उत्तराधिकारियों का चयन पिछली चयन प्रणाली के अनुसार नहीं किया जाता—जिसमें प्रधानमंत्री, प्रतिपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों। उन्हें यह भी मांग करनी चाहिए कि जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित रहते हुए चुनाव कराए गए, उन चुनावों को निरस्त किया जाए और नए चुनाव कराए जाए। यह भी माँग हो कि मतदान EVM के बजाय बैलेट पेपर से हो, क्योंकि अभी तक ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नहीं बनाई गई है जिसे हैक न किया जा सके। यही कारण है कि विकसित देशों में EVM का उपयोग नहीं किया जाता। यदि हम अपने लोकतंत्र को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो पूरे देश को जागरूक और एकजुट करना होगा। SIR पर दिए गए फैसले से सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा को धक्का लगा है। यह प्रतिष्ठा की दृष्टि से उस फैसले के समान है जिसने आपातकाल को सही ठहराया था। निर्वाचन आयुक्तों के चयन से संबंधित कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर हो रही देरी भी सर्वोच्च न्यायालय के बारे में गलत संदेश दे रही है—क्योंकि यह स्पष्ट है कि निर्वाचन आयुक्तों का चयन सत्तारूढ़ दल द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष चयन समिति द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके। आइए, हम सब मिलकर लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों। आर. के. सिंह (सेवानिवृत्त IAS, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव) @abhijeet_dipke @Cockroachisback @RahulGandhi @kharge @ArvindKejriwal @MamataOfficial @yadavakhilesh @mkstalin @yadavtejashwi @Pawankhera
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अश्विनी कुमार, दिल्ली के पूर्व डिविज़नल कमिश्नर और MCD कमिश्नर के बेटे पर दिल्ली पुलिस मेहरबान है! इनके बेटे पर एक महिला ने घर में घुसकर मारपीट और धमकी का आरोप लगाया, पर पुलिस ने FIR दर्ज़ नहीं की! ये वही दिल्ली पुलिस है जो स्वाति मालीवाल के “गढ़े आरोप” पर अरविंद केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार को तुरंत गिरफ़्तार कर लेती है! ये वही दिल्ली पुलिस है जो इस बात की भी तफ्तीश नहीं करती कि विभव कुमार पर मारपीट का आरोप उस जगह लगा है जहाँ CCTV कैमरे थे, कई सरकारी कर्मचारी ड्यूटी पर थे। न कोई फ़ुटेज, न किसी और का बयान, बस सीधे गिरफ़्तारी, और तीन महीने तक “नो बेल, ओनली जेल”! और अश्विनी कुमार के बेटे के मामले में दिल्ली पुलिस कुछ नहीं करती, जबकि मारपीट, यौन उत्पीड़न पीड़िता के घर में हुआ है, पीड़िता की शिकायत पर FIR तक दर्ज़ नहीं करती! दरअसल देश में अब क़ानून का शासन नहीं, क़ानून पर कंट्रोल करने वालों का शासन है! लिहाज़ा एक IAS अधिकारी का बेटा देश की राजधानी में एक महिला के ख़िलाफ़ ज़ुर्म करके भी ख़ुलेआम घूमता है, FIR भी नहीं होती, पीड़िता को सुरक्षा और न्याय के लिए दर दर भटकना पड़ता है। और आम जनता या राजनैतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ झूठे आरोप पर भी बुलडोज़र चलता है, गिरफ़्तारी होती है…
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देश में करीब 4,100 विधानसभा क्षेत्र हैं। हर क्षेत्र की वोटर लिस्ट की जिम्मेदारी वहाँ के स्थानीय चुनाव अधिकारी (ERO) की है। कानून ने उसे यह अधिकार दिया है कि वह दस्तावेज़ देखे, लोगों की बात सुने और नाम जोड़ने या हटाने पर फैसला करे। लेकिन ज्ञानेश कुमार ने सभी 4,100+ अधिकारियों के हाथ बाँध दिए गए। अधिकारी ज़मीन पर मौजूद है, जिम्मेदारी भी उसी की है, लेकिन नाम काटने जोड़ने का फैसला दिल्ली में बैठी एक अफ़सर को दे दिया गया। अब महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी ने खुद चुनाव आयोग को लिखकर कहा है कि स्थानीय अधिकारियों को उनके कानूनी अधिकार इस्तेमाल करने दिए जाएँ। चुनाव आयोग के दोनों आयुक्त भी ज्ञानेश कुमार के इस फैसले पर लिखित आपत्ति उठा चुके थे।
Another day, another @IndianExpress break on the EC. Sept 23. Our investigation breaks. The EC responds the same day: its platforms are protected against "unauthorized tampering", and EROs "function as per statutory powers." What we didn't know was this. The very next day, Maharashtra's Chief Electoral Officer (CEO) wrote to the EC in Delhi asking for FOUR changes to ECINet, so EROs could use the discretion the law already gives them. The same concern Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi had put on record. Stay with me for @vallabhozarkarr's cracker of a story in today's edition (1/11)🧵
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Durgesh Pathak retweeted
Your blue eyed boy Ashwani Kumar’s son Anmay assaulted my daughter . Still no action from #DelhiPolice. Not even an FIR registered 40 hours!!!!! What would you say? @thekiranbedi @manojsinha_ #justiceformoha #help #assault
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